मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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हृदय के कमल को खिलाना” एक लाक्षणिक वाक्यांश है जिसका अर्थ है आंतरिक शांति, करुणा और आध्यात्मिक शुद्धता प्राप्त करना। कमल का फूल कीचड़ में खिलकर भी शुद्ध और सुंदर बना रहता है, उसी तरह मनुष्य को भी जीवन की उलझनों, चुनौतियों और कष्टों के बीच रहते हुए भी अपने हृदय के भीतर शांति और दिव्यता विकसित करनी होती है और अपने अंतरात्मा में छिपी अच्छाई, पवित्रता व ज्ञान को जागृत करना होता है। वैसे हमें धर्म की व्यवस्थाओं के नाम पर स्वर्ग-नरक के नक्शे दे दिए जाते हैं या ईश्वर को पाने के नाम पर अरबों-खरबो खर्च भी हो जाते हैं, परंतु ना तो नक्शे मुक्ति दे पाते हैं और ना ही धन का व्यय ईश्वर को उपलब्ध करा सकता है। इस सत्य को स्वीकार करें कि ईश्वर सहज है, सरल है। उसका अस्तित्व हमारे भीतर ही है।
कमल हमेशा कीचड़ में खिलता है परंतु उसमें लिप्त नहीं होता, इसी तरह हम भी बाहरी अराजकता का सामना करते हुए अपने आंतरिक प्रकाश और शांति को बनाए रख सकते हैं। भला मछली जो सागर में ही जी रही है, वह अगर जीवन भर तक सागर की तलाश करती रहे तो वह सागर को कैसे पा सकेगी। जैसे सूर्य की किरणें यदि सूर्य की तलाश करें, कि सूर्य कहां है, तो यह हास्यास्पद लगता है। इसलिए शुचितापूर्ण भाव से अपने अंतर ह्रदय के कमल को खिलाओ और ध्यान की बैठक में परमब्रह्म को विराजमान करने की कोशिश करो ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

