मूकनायक/नीरज कुमार/शिमला संभाग प्रभारी | हिमाचल प्रदेश सरकार की हालिया “पशु मित्र” भर्ती नीति ने सामाजिक न्याय और आरक्षण की मूल भावना पर कुठाराघात किया है। इस भर्ती के चयन मानदंडों में BPL (आय 50,000 से कम) और EWS (आय 8 लाख तक) के परिवारों को एक समान मान लिया है। जहां SC/ST/OBC/ को BPL में आने के लिए 50 हजार से कम आय होना अनिवार्य है वहीं EWS परिवारों को बिना 8 लाख तक की आय के साथ BPL के बराबर लाभ देने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। BPL और EWS परिवारों को 1.5 अंक देने का प्रावधान रखा गया है, जबकि SC/ST/OBC उम्मीदवारों को मात्र 1 अंक का हकदार माना गया है। यह न केवल हास्यास्पद और अन्यायपूर्ण है, बल्कि संविधान की आत्मा और सामाजिक समानता के सिद्धांतों के साथ खुला विश्वासघात है।
सामाजिक न्याय का अपमान
भारतीय संविधान ने अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक और ऐतिहासिक उत्पीड़न को संबोधित करने के लिए की थी। ये वर्ग सदियों से जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और अवसरों से वंचना का शिकार रहे हैं। आरक्षण का उद्देश्य आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि सामाजिक समानता सुनिश्चित करना था। लेकिन हिमाचल सरकार ने SC/ST/OBC के ऐतिहासिक संघर्ष को एक अंक में समेटकर उनकी वंचना का मजाक उड़ाया है। दूसरी ओर, EWS को 1.5 अंक देकर यह साबित कर दिया गया कि सरकार सामाजिक उत्पीड़न को नगण्य मानती है और आर्थिक स्थिति को ही असली मापदंड मान रही है। यह संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) का खुला उल्लंघन है।
EWS को अनुचित तरजीह: तर्कहीन और अन्यायपूर्ण
EWS वर्ग, जो सामान्य श्रेणी से संबंधित है, ने कभी जातिगत अत्याचार या सामाजिक बहिष्कार का सामना नहीं किया। उनकी चुनौती केवल आर्थिक है, जबकि SC/ST/OBC वर्गों को आर्थिक तंगी के साथ-साथ सामाजिक भेदभाव का दंश भी झेलना पड़ता है। ऐसे में EWS को SC/ST/OBC से अधिक अंक देना न केवल तर्कहीन है, बल्कि सामाजिक न्याय की नींव को कमजोर करने वाला कदम है। यह नीति साफ तौर पर दर्शाती है कि सरकार सामाजिक उत्पीड़न को गंभीरता से नहीं ले रही और सामान्य वर्ग को खुश करने की दिशा में काम कर रही है।
आरक्षण को गरीबी उन्मूलन योजना बनाना गलत
आरक्षण कोई दान या गरीबी उन्मूलन योजना नहीं है। इसका उद्देश्य उन वर्गों को सशक्त करना है जो सामाजिक रूप से हाशिए पर धकेल दिए गए थे। लेकिन हिमाचल सरकार ने इस भर्ती के जरिए आरक्षण को आर्थिक आधार तक सीमित कर दिया है। यह न केवल डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे संविधान निर्माताओं के सपनों का अपमान है, बल्कि सामाजिक सुधार के लिए किए गए तमाम संघर्षों पर भी कुठाराघात है। सरकार की मानसिकता पर सवाल
यह नीति सरकार की सामाजिक न्याय विरोधी मानसिकता को उजागर करती है। एक तरफ SC/ST/OBC को आरक्षण के नाम पर बार-बार निशाना बनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर EWS को प्राथमिकता देकर सामाजिक रूप से सशक्त वर्ग को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह न केवल सामाजिक समरसता को ठेस पहुंचाता है, बल्कि संविधान की मूल भावना के खिलाफ एक खतरनाक मिसाल कायम करता है।
तत्काल सुधार की जरूरत
हिमाचल सरकार की यह नीति आरक्षण की मूल भावना के साथ छल है। यह सामाजिक न्याय को आर्थिक मापदंडों में बदलने का कपटपूर्ण प्रयास है। यदि इस तरह की नीतियां जारी रहीं, तो आरक्षण का ढांचा खोखला हो जाएगा और सामाजिक समानता का सपना अधूरा ही रहेगा। सरकार को चाहिए कि वह इस भेदभावपूर्ण प्रावधान को तत्काल वापस ले और SC/ST/OBC वर्गों को उनका संवैधानिक हक सुनिश्चित करे। अन्यथा, यह नीति न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि न्यायालय में चुनौती का सामना करने के लिए भी तैयार रहे। सामाजिक न्याय का यह अपमान स्वीकार्य नहीं है, और सरकार को इसके लिए जवाबदेह होना ही होगा।

