मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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लोग अक्सर किसी की बाहरी सुंदरता को ही देखते हैं और उसी से आंकलन कर आंतरिक सुंदरता की उपेक्षा कर देते हैं, जबकि तन से कहीं ज्यादा मन की सुंदरता जरूरी होती है क्योंकि हमारा चित्त और मन जैसा सोचता है, वही चीज हमारे व्यवहार में भी उतरती है। हमारी सोच अच्छी रहती है तो व्यवहार भी अच्छा रहता है। इस नाते हमें किसी व्यक्ति की तन की नहीं बल्कि मन की सुंदरता देखनी चाहिए। उसी के आधार पर उसका मूल्यांकन करना चाहिए क्योंकि बाहरी सुंदरता बस दिखाने के लिए और लोगों को आकर्षित करने के लिए होती है, लेकिन मन की सुंदरता दिखावे की नहीं होती है और ना ही समय के साथ इसमें कोई बदलाव आता है ।
चेहरे की सुंदरता कोई मायना नहीं रखती, बल्कि सुंदरता के लिए इंसान का आचरण और सद्व्यवहार का सुन्दर होना जरुरी है। निर्दोषता ही मनुष्य को सुंदर बनाती है । हर बच्चा जन्म से सुंदर होता है और बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता है, उसकी सुंदरता व मासूमियत खो जाती है । दिखने में मनुष्य कितना भी सुंदर क्यों ना हो, अगर उसका मन तनावग्रस्त है, क्रोध, निराशा और नकारात्मक विचारों से भरा हुआ है तो उसका जीवन नरक के समान है क्योंकि मनुष्य में निराशा और क्रोध हमेशा अतीत को लेकर आते हैं, वहीं व्यग्रता हमेशा भविष्य को लेकर होती है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य का असली सौंदर्य आनंद ही है और आनंद मनुष्य के भीतर से होता है ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

