हरियाणा/करनाल/असंध/मूकनायक पत्रकार रमेश पोडिया।
असंध विधानसभा के युवा नेता बहुजन समाज पार्टी के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष और असंध विधानसभा के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र राणा के सपुत्र गोपाल राणा ने आज कबीर जयंती के उपलक्ष पर विशेष वार्ता में बताया कि आज हम महान विचारक, दार्शनिक, युगप्रवर्तक संत, कवि और समाज-सुधारक को स्मरण करते हैं, जिन्होंने अपने विचारों, काव्य और संघर्ष से भारतीय समाज में चेतना की नई अलख जगाई वो संत कबीर दास जी थे। उनका जन्म ऐसे समय हुआ जब समाज घोर अंधविश्वास, जाति-जाति, धार्मिक कट्टरता और सामाजिक भेदभाव के अंधकार में डूबा हुआ था। ऐसे युग में कबीर की वाणी ने सत्य, समानता और मानवता का प्रकाश फैलाया।
कबीर दास को भारतीय नवजागरण का अग्रदूत इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने मध्यकालीन भारत की सामाजिक जड़ताओं और धार्मिक रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उन्होंने न सिर्फ ब्राह्मणवाद और मूर्तिपूजा की आलोचना की, बल्कि इस्लामी कट्टरता और पाखंड का भी विरोध किया। वे जाति, धर्म, और संप्रदाय से ऊपर उठकर इंसानियत की बात करते थे।
उनकी रचनाएं साधारण जनमानस की भाषा में थीं सधुक्कड़ी, अवधी, और खड़ी बोली। उन्होंने जो दोहे कहे, वे सीधे दिल में उतरते हैं और आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं:
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।”
धर्म का मानवीकरण
कबीर ने धर्म को कर्म, आत्मा और प्रेम से जोड़ा। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय पुनर्जागरण के उस विचार की नींव रखता है जहाँ व्यक्ति को सोचने, सवाल उठाने और आत्मचिंतन करने की स्वतंत्रता मिलती है। उन्होंने भक्ति को अंधभक्ति नहीं, बल्कि एक जागरूक जीवन दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया।
एक समतामूलक समाज की परिकल्पना
कबीर का सपना था एक ऐसा समाज जहाँ कोई ऊँच-नीच, छुआछूत, और धार्मिक बँटवारा न हो। उन्होंने बहुजन समाज को स्वर दिया और सत्ता व धर्म के ठेकेदारों से निर्भीक होकर टकराए।
कबीर: कल भी प्रासंगिक, आज भी प्रेरणादायक
आज के दौर में जब समाज फिर से धार्मिक उन्माद,असहिष्णुता और सामाजिक विषमता की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब कबीर की वाणी हमें सत्य, करुणा और विवेक का मार्ग दिखाती है।
इस कबीर जयंती पर आइए हम सब संकल्प लें कि हम उनके विचारों को न सिर्फ पढ़ें, बल्कि अपने जीवन में आत्मसात करें। कबीर सिर्फ इतिहास नहीं, एक जीवित चेतना हैं।

