मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदला जा सकता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने कर्मों को कैसे संभालते हैं। दुर्भाग्य का स्वरूप देखने के लिए आपको समाज में मौजूद निम्न स्तर के लोगों को देखना चाहिए जो कि गरीबी लाचारी बेबसी अपाहिज की जिंदगी जी रहे हैं, इन लोगों के पास दो वक्त की रोटी भी नहीं है । दुर्भाग्य से ग्रसित मनुष्य के पास सर छुपाने की भी जगह नहीं होती, उनका कोई ठिकाना नहीं होता । वे दर दर की ठोकरें खाते रहते हैं। वहीं उच्च स्तर में जीने वाले लोगों का दुर्भाग्य देखिए, कई लोगों के पास धन दौलत शोहरत सब कुछ होता है, लेकिन उनके जीवन में कोई खुशी नहीं होती, उनकी कोई औलाद नहीं होती । यह दुख भी दुर्भाग्य का स्वरूप है । समाज में प्रतिष्ठित किसी मनुष्य के जीवन में एकदम से कोई ऐसी अनहोनी घटना घट जाती है, जो उसे हिला कर रख देती है, यह दुर्भाग्य ही है ।
मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा दुख आवागमन (जन्म और मृत्यु का चक्र) है। जब तक आत्मा इस चक्र में फंसी रहती है, तब तक उसे असंख्य प्रकार के दुखों का सामना करना पड़ता है जिसमें जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, बीमारी, गरीबी और मानसिक कष्ट शामिल हैं। इसलिए कभी कुछ नया पाने के लिए, वो मत खो देना, जो पहले से आपका है। हाथ में खींची भाग्य रेखा में उलट फेर नहीं किया जा सकता, परंतु हर हाल में मुस्कुराने की मानसिकता विकसित कर ली जाए तो दुर्भाग्य की अंगुली में भी सौभाग्य की अंगूठी पहनाई जा सकती है क्योंकि दुर्भाग्य और सौभाग्य जीवन के ऐसे महत्वपूर्ण घटक हैं जो हमें अपने जीवन में उतार-चढ़ाव सिखाते हैं ।
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

