मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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वास्तव में, एक श्रेष्ठ और सार्थक जीवन वही है, जो दो मजबूत स्तंभों पर टिका हो, सीखने की अटूट ललक (बुद्धिमत्ता) और भावनाओं व इच्छाओं पर पूर्ण विजय (शक्ति)। बुद्धिमत्ता केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि हर पल कुछ नया सीखने की जिज्ञासा में है। जब हममें सीखने की ललक होती है, तो हम अपनी गलतियों को भी एक गुरु की तरह देखते हैं । हर परिस्थिति, हर व्यक्ति और प्रकृति के हर कण से कुछ न कुछ सीखना ही जीवन को जीवंत बनाए रखता है। यदि हमारी अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर हमारा वश नहीं है, तो हम कभी भी भटक सकते हैं। असली ‘शक्ति’ दूसरों को झुकाने में नहीं, बल्कि खुद के मन को वश में करने में है।
जब हम अपनी क्रोध, मोह, ईर्ष्या और अनियंत्रित इच्छाओं पर नियंत्रण पा लेते हैं, तो विपरीत परिस्थितियों में भी हमारा मानसिक संतुलन नहीं बिगड़ता। यही आत्म-नियंत्रण हमें आत्म-सम्मान और असीम शांति देता है। बुद्धिमत्ता हमें ‘क्या करना है, यह सिखाती है और आत्म-नियंत्रण हमें ‘क्या नहीं करना है, इसकी शक्ति देता है। जब सीखने की ललक और आत्म-अनुशासन का यह अद्भुत संगम होता है तो मनुष्य केवल जीता नहीं है, बल्कि वह अपने जीवन को एक उत्कृष्ट कृति बना देता है। ऐसा जीवन ही स्वयं के लिए आनंदमयी और अन्य के लिए प्रेरणादायक होता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा