Tuesday, October 20, 2026
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कठोर कानून, खोखली सुरक्षा, बस यही है हमारे देश और समाज का एक कड़वा सच

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आज हमारे देश में महिलाओं, बेटियों और शोषित समाज की सुरक्षा के लिए कई कड़े कानून मौजूद हैं। पॉक्सो एक्ट, दुष्कर्म के खिलाफ फांसी की सजा और अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे सख्त कानूनी प्रावधान कागजों पर बेहद मजबूत नजर आते हैं। इसके बावजूद, आए दिन अखबारों और समाचारों में बेटियों और वंचितों के साथ होने वाली बर्बरता की खबरें यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि कानून कठोर होने के बाद भी हमारा समाज असुरक्षित क्यों है?
इस असुरक्षा के पीछे सबसे बड़ा कारण कानून का धीमा क्रियान्वयन और कम दोषसिद्धि दर है। मामलों की जांच में ढि़लाई, गवाहों का मुकर जाना और अदालतों में सालों-साल चलने वाले मुकदमों के कारण अपराधियों के मन से कानून का डर खत्म हो चुका है। वे जानते हैं कि वे लूपहोल्स का फायदा उठाकर बच निकलेंगे।
दूसरा और सबसे गहरा कारण हमारी सामाजिक मानसिकता है। आज भी हमारा समाज पुरुषवादी और सामंती सोच से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। जब तक घर, स्कूल और कार्यस्थल पर महिलाओं और शोषितों को बराबरी का सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक केवल पुलिस और कोर्ट के भरोसे सुरक्षा मुमकिन नहीं है। अक्सर पीड़ित को ही समाज के तानों और लोक-लाज का सामना करना पड़ता है, जिससे अपराधी बेखौफ हो जाते हैं। हालांकि सख्त कानून जरूरी हैं, लेकिन वे तब तक बेअसर रहेंगे, जब तक हमारी न्याय प्रणाली त्वरित नहीं होगी और समाज की सोच में क्रांतिकारी बदलाव नहीं आएगा। जब तक हम बेटियों और शोषितों को “कमजोर” समझने के बजाय उन्हें समान अधिकार और सम्मान नहीं देंगे, तब तक असुरक्षा का यह अंधकार दूर नहीं हो सकता।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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