दोहों में चेतना, शब्दों में साहस—समय, समाज और सत्ता से संवाद करती रचना
मूकनायक/बीसी गोठवाल प्रदेश प्रभारी हरियाणा
परिवर्तनकारी साहित्य मंच के तत्वावधान में डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ द्वारा रचित दोहा-संग्रह ‘शब्द यथार्थ’ का भव्य विमोचन समारोह रविवार को आंबेडकर भवन, नारनौल में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक पुस्तक विमोचन नहीं, बल्कि समकालीन साहित्य में सत्य, साहस और सामाजिक चेतना के प्रति प्रतिबद्ध रचनात्मक परंपरा का उत्सव बन गया।
समारोह में मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार जोधपुर से पधारे डॉ ताराराम गौतम रहे, जबकि अध्यक्षता उच्चतर शिक्षा विभाग के सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ सुमेर सिंह यादव ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में भीम प्रज्ञा संपादक एडवोकेट हरेश पंवार एवं केंद्रीय विश्वविद्यालय महेंद्रगढ़ के सहायक प्रोफेसर डॉ. अरविंद सिंह तेजावत मंचासीन रहे। साहित्य मंच के सलाहकार सुंदरलाल ‘उत्सुक’ और महासचिव मनोज बुलाण ने अतिथियों का स्वागत-अभिनंदन किया। मंच संचालन रविंद्र सैनी ने प्रभावशाली ढंग से किया।
“दोहा छोटा, पर घाव गहरा”—तारा राम गौतम
मुख्य अतिथि ताराराम गौतम ने कहा कि ‘शब्द यथार्थ’ एक विशिष्ट और जरूरी कृति है। उन्होंने डॉ. शिवताज सिंह की दोहा-साधना की सराहना करते हुए कहा कि यह संग्रह बिहारी की परंपरा की याद दिलाता है—
“देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।”
गौतम ने कहा कि ताज के दोहे दिखने में संक्षिप्त होते हुए भी समय के यथार्थ पर तीखा प्रहार करते हैं।
‘ताज’ का साहित्य-सृजन बेबाक सच कहने का साहस – डॉ सुमेर सिंह यादव
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. सुमेर सिंह यादव ने ‘शब्द यथार्थ’ की प्रासंगिकता पर संक्षिप्त किंतु प्रभावी विवेचन प्रस्तुत करते हुए कहा कि डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ का साहित्य-सृजन बेबाक सच कहने का साहस रखता है। उन्होंने कहा कि यह कृति समाज के भीतर छिपे अन्याय, भय और मौन को उजागर करती है।
उन्होंने दोहे—
“चिड़िया रोए नीड़ में, कैसा राज समाज।
कौन सुने किससे कहें, बाज न आवे बाज।”
का संदर्भ लेते हुए बताया कि कवि यहां सत्ता, व्यवस्था और समाज की संवेदनहीनता पर तीखा व्यंग्य करता है। चिड़िया का नीड़ सामान्य जन का संसार है, जहां पीड़ा है पर सुनने वाला कोई नहीं। बाज सत्ता और प्रभुत्व का प्रतीक है, जो चेतावनी के बाद भी नहीं रुकता। डॉ. यादव के अनुसार, ‘शब्द यथार्थ’ ऐसे ही दोहों के माध्यम से समय के यथार्थ को सामने रखता है और पाठक को चुप्पी तोड़ने तथा सच के साथ खड़े होने के लिए प्रेरित करता है।
“सत्य कहने का साहसिक दस्तावेज”-एडवोकेट हरेश पंवार
मनचस्पी विशिष्ट अतिथि भीम प्रज्ञा के प्रमुख संपादक एडवोकेट हरेश पंवार में कहा कि-‘शब्द यथार्थ’ केवल एक दोहा-संग्रह नहीं, बल्कि समय, समाज और सत्ता के बीच खड़े होकर सत्य कहने का साहसिक दस्तावेज है।”
“सच बोले तो सब गया, प्रीत बंधुता प्यार।
हमने सच को सच कहा, आदत से लाचार।”
साहित्यकार पंवार ने स्पष्ट किया कि यह पुस्तक पाठक को मनोरंजन नहीं, मनन के लिए आमंत्रित करती है। ऐसी कृतियां साहित्य को जीवित रखती हैं और समाज को दिशा देती हैं। उनके अनुसार, डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ की यह रचना समकालीन हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज होगी।
दोहों में समकालीन यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति
विशिष्ट अतिथि डॉ. अरविंद सिंह तेजावत ने ‘शब्द यथार्थ’ को हिंदी साहित्य की दोहा विधा में लंबे अंतराल के बाद आया एक महत्वपूर्ण और समसामयिक दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ ने दोहों के माध्यम से वर्तमान सामाजिक विषमताओं, शिक्षा व्यवस्था की गिरावट और राजनीतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य किया है।
पुस्तक के दोहे—
“शिक्षा अति महंगी हुई, डिग्री सब बेकार…” और
“ढोंगी नेता पढ़ा रहे, अपने पुत्र विदेश…”
समाज की वास्तविकताओं को बेबाकी से उजागर करते हैं। डॉ. तेजावत के अनुसार यह कृति केवल काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करने वाली सार्थक साहित्यिक पहल है।
दोहा-परंपरा का पुनर्पाठ—लेखक का आत्मकथ्य
पुस्तक के लेखक और कार्यक्रम के आयोजन डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ ने अपने आत्मकथ्य में कहा कि उन्होंने दोहा-छंद की परंपरा को केवल संरक्षित नहीं किया, बल्कि नए सामाजिक संदर्भों में पुनर्परिभाषित किया है। उनका मानना है कि दोहा आकार में छोटा, पर अर्थ में गहन होता है—और आज के समय में वही दोहा सबसे प्रभावी है, जो सत्ता, स्वार्थ और चाटुकारिता के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध बन सके।
साहित्यिक संवाद और सहभागिता
समारोह में साहित्यकार राधेश्याम गोमला, प्रमुख समाजसेवी बिरदी चंद गोठवाल, सुनील पागल, मदनलाल डाडैइया, सेवानिवृत्त प्राचार्य अमर सिंह निम्होरिया, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अंजू रानी, प्रधान चन्दन सिंह जालवान, प्रोफेसर बस्ती राम यादव, डॉ. कर्मवीर सिंह, कामरेड सुभाष चंद्र एडवोकेट, एडवोकेट रितेश, डॉ. विवेक, डॉ. इंद्राज सिंह, एसडीओ सतीश धानिया, महेंद्रसिंह खन्ना सहित अनेक कवि, लेखक, शिक्षाविद् और साहित्य-प्रेमी उपस्थित रहे। मंच के सह-सचिव सुनील कुमार, स्टेट अवार्डी अमरजीत, रामकिशन मरोड़िया, एडवोकेट गजानंद दौचानिया सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिकों की सहभागिता ने आयोजन को सार्थक बनाया।
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“शब्दों में यथार्थ, दोहों में चेतना—डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ की काव्य-साधना का सजीव दस्तावेज”
साहित्य के क्षेत्र में कुछ अवसर केवल औपचारिक नहीं होते, वे विचार और संवेदना के उत्सव बन जाते हैं। ‘शब्द यथार्थ’ का लोकार्पण ऐसा ही क्षण था। पुस्तक का शीर्षक और आवरण देखते ही स्पष्ट हो जाता है कि यह कृति सजावटी शब्दों की नहीं, बल्कि जीवन और समाज के कठोर यथार्थ से संवाद करती है।
आज के तथाकथित “चमचा युग” में, जहाँ विवेक और स्वाभिमान अक्सर समझौते की भेंट चढ़ जाते हैं, वहाँ डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ की रचनाएँ साहस का पाठ पढ़ाती हैं और कविता को नैतिक हथियार के रूप में स्थापित करती हैं।

