
मूकनायक
बिलासपुर छत्तीसगढ़
फूले निःशुल्क पाठशालाओं में नियमित रूप से निशुल्क अपनी सेवा देने वाले आयुष्मान लोकेश उके ने बच्चों के लिए कुर्सियां उपलब्ध कराने पर इस पुनीत कार्य करने लिए आुष्मान विमलेश उके और आयुष्मान मुकेश गोंडाने का तह–ए–दिल से शुक्रिया कहा है।
सेवा समाज के प्रति समर्पित आयुष्मान लोकेश उके ने अपने अनुभव और बच्चों के के प्रति लगाओ को साझा करते हुए कहा कि :-
बरसात का मौसम शुरू हो चुका है। बीते कुछ दिनों से शाम ढलते ही बारिश अपना असर दिखाने लगती है। अक्सर देखा गया है कि हल्की सी बारिश की बूंदें बच्चों को ट्यूशन से दूर कर देती हैं
आज बारिश हो रही है, नहीं जा पाऊँगा, यही सामान्य जवाब होता है। लेकिन फूले निःशुल्क पाठशाला के बच्चे कुछ अलग ही मिट्टी के बने हैं।चाहे पंचशील बुद्ध विहार हो या आनंद बुद्ध विहार, बच्चों का उत्साह बरसात की बूंदों में भी नहीं भीगता। परंतु, जब बात आती है जैतखाम (आंबेडकर नगर) में चलने वाली हमारी कक्षा की, तो मेरा मन सचमुच भावुक हो उठता है।यहां न तो कुर्सियां हैं, न बैठने के लिए गद्दे, और न ही बारिश से बचाने वाली छत।फिर भी, इन कठिन परिस्थितियों के बीच बच्चों की पढ़ाई के प्रति निष्ठा अद्भुत है।बरसते बादल भी इनका हौसला नहीं डिगा पाते।
कई बार जब बारिश थम भी जाती है, तब भी गीली सड़कों के कारण बच्चे अपनी चटाई तक नहीं बिछा सकते फिर भी वे आते हैं, बैठते हैं, और पूरे मन से पढ़ते हैं।पिछले दिनों रविवार के पंचशील बुद्ध विहार की वंदना के बाद मेरी मुलाकात विमलेश उके से हुई। उन्होंने सामने से ही फूले निःशुल्क पाठशाला के लिए सहयोग की बात की।
सच कहूं तो मैंने अब तक किसी से आर्थिक मदद की अपेक्षा नहीं की थी मेरी सोच रही है कि यह सेवा समाज के प्रति समर्पण है। मैंने विनम्रता से पहले कहा, “अभी कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन जैसे ही मैंने जैतखाम की कक्षा को याद किया, दिल भारी हो गया।मैंने झिझकते हुए कुर्सियों की जरूरत साझा की।विमलेश ऊके ने बिना एक पल गंवाए, उसी क्षण सहायता का भरोसा दिलाया और देखिए आज बच्चे विमलेश ऊके के द्वारा सहयोग स्वरूप दी गई कुर्सियों में बैठ कर कितने इत्मीनान और निश्चिंत होकर पढ़ रहे है।इसी तरह मुकेश गोंडाने और उनकी जीवनसाथी ने छत्रपति शाहू महाराज जयंती पर विद्यार्थियों को नोटबुक वितरण कर इस सामाजिक प्रयास को मजबूती दी थी।मैं फूले निःशुल्क पाठशाला की ओर से इन सभी सहयोगियों का हृदय से आभार प्रकट करता हूँ।
आप सबकी मदद मुझे उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाती है, जब छत्रपति शाहू महाराज और बड़ौदा नरेश गायकवाड़ जैसे महानमानवों ने बाबासाहेब अंबेडकर का साथ दिया था, उन्हें सहयोग किया था तभी तो बाबासाहेब, बाबासाहेब बन पाए।आज भी अगर समाज के ऐसे सजग और संवेदनशील हाथ मिलें, तो एक नहीं, हजारों बाबासाहेब तैयार हो सकते हैं।

