हरियाणा/करनाल/मूकनायक पत्रकार रमेश पोडिया
बुद्ध, फुले, शाहू, पेरियार, आम्बेडकर के मिशन को एक नई पहचान व् दिशा देने वाले बहुजनो के मसीहा मान्यवर साहब कांशी राम के समाज, धर्म व् राजनीती से संबधित विचार…
गुरु गोविंदसिंह ने कहा है की, धरम के बिना राज नही और राज के बिना धरम नही, अर्थात धरम के बिना राज और राज के बिना धरम आगे नही बढ़ शकता। इसलिए मुझे भी पीछे मुड़कर सोचना पड़ा कि, जब सम्राट अशोक बौद्ध बना, तब बौद्ध धम्म बड़े पैमाने पर फला-फुला, जब सम्राट कनिष्क बौद्ध बना तो बौद्ध धम्म बड़े पैमाने पर फला-फुला, जब सम्राट हर्षवर्धन बौद्ध बना तो बौद्ध धम्म बड़े पैमाने पर फला-फुला.. तो इसलिए बौद्ध धम्म को फलना फूलना है, तो जो लोग बौद्ध धम्म को फैलाने वाले लोग है, उन लोगो को हुक्मरान बनना जरूरी है। अगर वो हुक्मरान बनते है, तो बौद्ध धम्म भी फलता-फूलता है।
मुझे ऐसा लगा कि, अगर जिंदगी में हमे किसी दिशा में आगे बढ़ना है, तो शुद्र और अतिशूद्र लोगो को हुक्मरान बनना जरूरी है। इन लोगो की हुकूमत होगी तो ये लोग अपने हिसाब से अपने कारोबार को चलाने लगेंगे, तो तब ही इनकी बात आगे बढ़ सकती है।
आज हमारे महापुरुष जिंदा नही है, हम लोग जिंदा है, इसलिए हम लोगो को उनके एजेंडा को लागू करना है और लागू करने के लिए उस एजेंडा को पहले अच्छी तरह समझना है।
बाबासाहब की मूवमेंट एक शरीर है, जिसमे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक ये जरूरी अंग है। जिसमे एक को भी छोड़ दिया जाए तो शरीर खराब हो जाएगा और बीमारी बढ़ जाएगी। इसलिए हमें सारी मूवमेंट को एक साथ आगे बढ़ाना है।
जब आदमी ईमानदारी से काम करता है तो उसके परिणाम भी बेहतर आते है। इसलिए आप लोगो को भी मेरी राय है कि आप लोग भी अपना समय व्यर्थ न गवाए और काम करे। जब तुम ईमानदारी से काम करोगे तो कामयाबी तुम्हे सलाम करेगी।
महामना ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज और बाबासाहब के बारे में मैं हमेशा सोचता रहता हूँ कि, सबसे बड़ा काम जो इन महापुरुषों ने अपनी जिंदगी में किया है, वो काम है, छुआछूत का अंत करने का, फिर उसके बाद अनपढ़ लोगो को पढ़ने-लिखने का मौका.. इसलिए खासकर जो लोग हजारो सालो तक छुआछूत का शिकार रहे उन लोगो को इन तीन चीजो के बारे में जानकारी रखना जरूरी है – छुआछूत का अंत, पढ़ने लिखने की शरुवात, पढ़ने लिखने के बाद आरक्षण। ये तीन चीजे हमारे बुजुर्गो के बारे मे, इन तीनो महापुरुषों के बारे में, खासकर अछूत कहे जाने वाले लोगो को ऋणी रहना चाहिए।
मुझे ऐसा लगा कि, अगर जिंदगी में हमे किसी दिशा में आगे बढ़ना है, तो शुद्र और अतिशूद्र लोगो को हुक्मरान बनना जरूरी है। इन लोगो की हुकूमत होगी तो ये लोग अपने हिसाब से अपने कारोबार को चलाने लगेंगे, तो तब ही इनकी बात आगे बढ़ सकती है।
दावे के साथ कहता हूं कि होउ सकत जरूरत चंद ईमानदार लोगो की फक्त है!
पत्रकार : इधर दलित राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की माँग बहुत तेजी से उठ रही है। इस बारे में आपकी क्या राय है ? साहब कांशी राम : देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी यदि दलित हो गए तो समाज का दबा-कुचला वर्ग न्याय की ओर किस तरफ देखेगा ? फिर तो देश का बंटाधार हो जायेगा।
यह ठीक है कि हमारे पास धन-दौलत की कमी है, मगर हमारे पास मुक्कों की कमी नहीं है। अगर हम 85 प्रतिशत मुक्कों को इकठ्ठा करके दुश्मन की नाक पर मार दें तो दुश्मन गुण्डागर्दी अत्याचार के हथकण्डे अपनाने की कोशिश नहीं करेगा।
राजनीति सत्ता के लिए होती है और सत्ता बिना संघर्ष के नहीं मिलती।
सिर्फ कोशिश करना ही ज़रूरी नहीं बल्कि उसमें कामयाबी भी मिलनी चाहिये।
हम लोग किसी के साथ बेइन्साफी करने या किसी का हक़ मारने के लिए नहीं बल्कि अपने साथ जो बेइन्साफी हो रही है और जो हमारा हक़ मारा जा रहा है, उसे संवैधानिक तरीके से प्राप्त करने के लिए इकठ्ठे हो रहे हैं।
आरक्षण विरोधी लहर का मुकाबला करने के लिये आरक्षण समर्थक लहर बनानी होगी।
आरक्षण कोई रोजी रोटी का मसला नही है, यह देश मे शासन प्रशासन में भागीदारी का मसला है। यदि लोकशाही में लोगो का बराबर हिस्सा नही होता है तो वह प्रजातंत्र सही ढंग से नही चल पाता है। मुल्क की बात आगे नही बढ़ती है, वह पिछड़ जाता है।
हमारे सामने सवाल यह नहीं कि हम क्या कर सकते हैं लेकिन सवाल यह है कि हम क्यों नहीं कर सकते ।
आज बहुत से नेताओं का यह रवैया बना गया है कि समाज को तो न बना सके खुद अपने को ही बना लें। इससे हमें नाराज़ नहीं होना चाहिए क्योंकि कुछ लोग जो स्वार्थ में लगे हैं उन्हें लगे ही रहना है।
जिन लोगों ने गलतियाँ की उन्हें हमें बार-बार नहीं दोहराना है, बल्कि उन गलतियों से हमें कुछ सीख लेकर बाबा साहब के मिशन का दुबारा जीवित करके उसे मंज़िल तक पहुँचाना है।
आज हमारे पास “सामग्री” बहुत है, बस ज़रूरत है उससे बड़ी ईमारत बनाने की।
अगर हमें बाबासाहब अम्बेडकर की मूवमेंट(आंदोलन) को चलाना है तो हमें इसे समय के साथ बदलने वाला बनाना होगा।
जब सभी लोग भारत के हर कोने से एक ही दिशा में सोचेंगे तो इस समाज(ओबीसी, एससी, एसटी) का भला एक-न-एक दिन ज़रूर होकर रहेगा।
जो लोग मिशन के लिए कुछ करने की भावना रखते हैं, उन्हें अपनी इस भावना को मिशन को देना होगा, केवल कहने से कुछ नहीं बनता है, उसके लिए तो त्याग की ज़रूरत पड़ती है।
अम्बेडकरवाद को दुबारा जीवित करना तभी किसी काम का है जब यह टिकाऊ रह सके।
आज ज़रूरत है दस हज़ार लीडरशिप बनाने की। ज़रूरत है उसे सामाजिक शिक्षा देने की, आवश्यकता है उसे मिशनरी भावना से कार्य करने की।
ज़माने के हिसाब से हमें आगे बढ़ना है; मक्खी पर मक्खी मार कर हम आगे नहीं बढ़ सकते।
बिना अपना मीडिया बनाये हम अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पायेंगे।
जो आंदोलन त्याग और बलिदान से बनाया गया हो, उसे आसानी से दबाया नहीं जा सकता।
मुझे ऐसा लगा कि अगर हमनें फुले-शाहू-अंबेडकर की विचारधारा को आगे नहीं बढ़ाया तो इस देश का दबा-कुचला इंसान, सदियों तक उठकर खड़ा नहीं हो सकेगा।
बड़ी मुश्किल से तो हमें मौका मिलता है और इसलिये हमें कोई भी मौका गवाना नहीं चाहिये।
पुरे देश में मुझे ऐसे लगभग 100 महापुरुष नज़र आते हैं, जिन्होंने मानवतावादी समाज व्यवस्था का निर्माण करने के लिये संघर्ष किया।
पत्रकार: हिन्दू धर्म के बारे में आपकी क्या राय है ? जिस धर्म में लोगों को छुआछूत करने की शिक्षा मिलती हो, उसे धर्म कहा जा सकता है क्या ।
जब तक दबे कुचले लोगों में आपस में भाईचारा नहीं होगा, तब तक उन्हें अपने शोषण और दमन के लिये दूसरों को दोष देने का कोई हक़ नहीं है।
भारत के लिये बहुत बड़ा खतरा बने हुये ये तीन “एम”; मनी, मीडिया, माफिया।
पत्रकार: क्या आप हिंसा का प्रचार कर रहे हैं? कांशी राम: मैं शक्ति का प्रचार कर रहा हूँ हिंसा को रोकने के लिये हमारे पास शक्ति होनी चाहिये।
मैं तो ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक ही काम कर रहा हूँ, अपने नालायक समाज को उसकी नालायकी दूर करके लायक बनाने में लगा हुआ हूँ।
फुले-शाहू-अम्बेडकर आज हमारे बीच नहीं हैं, इसलिये अब मौक़े के हिसाब से हमें ही विचारधारा को बनाना होगा।
कहते है की सप्रीम कोर्ट से ऊपर कोई कोर्ट नहीं है, मैं नहीं मानता हूँ; मैं समझता हूँ कि लोगों कि कचहरी इस देश में सबसे बड़ी कचहरी है।
हम ज़ुल्म करने वालों की नहीं, सहने वालों की निंदा करते हैं, हम ज़ुल्म नहीं सहेंगे और मुक़ाबला करके ज़ालिम का हौसला पस्त करेंगे।
जंग के मैदान में, चाहे वह बैलट का हो या बुलेट का, हर प्रकार से अपने आप को तैयार करना है।
जाती एक दो-धारी तलवार है, अगर आपने इसे अपने फायदे के लिये इस्तेमाल करना सिख लिया तो फिर यह इसके बनाने वालों को ही काटना शुरू कर देती है।
पत्रकार : क्या आप एक आँख के लिये एक आँख की वकालत कर रहे है ? कांशी राम : मैं अपने मानने वालों से कहता हूँ, एक ईंट का जवाब दो पत्थरों से दो।
परिवर्तन लाने के लिये हमें बहुत कुछ करना है, यह हमारे ऊपर निर्भर करता है की हम कितना कर पाते हैं।
हमें राज-पाट तो बैलट से लेना है लेकिन तैयारी बुलेट की भी रखनी है।
मेरा लक्ष्य आरक्षण लेना नहीं, बल्कि आरक्षण देना है।
जिनका स्वाभिमान मरा है वे ही ग़ुलाम है, इसलिये सिर्फ़ स्वाभिमानी लोग ही संघर्ष की परिभाषा समझते है।
मैंने आंदोलन चलाना बाबासाहब आंबेडकर से सीखा और कैसे नहीं चलाना महाराष्ट्र के उनके मानने वालों से।
आंदोलन में सबसे अहम भूमिका लीडरशिप(नेतृत्व) की होती है।
अगर आप किसी आंदोलन को कैसे नहीं चलाया जाना है नहीं जानते है, तो आप उसे कैसे चलाया जाना चाहिए नहीं जान पाएंगे।
जो विरोध करते हैं कि यह सही नहीं हैं, मौका मिलने पर उन्हें बताना होगा कि सही क्या है।
इतिहास बनाने वालों को इतिहास से सबक़ लेना बहुत ज़रूरी ।
अगर हमें इस देश का शासक बन कर बाबासाहब अम्बेडकर का सपना पूरा करना है तो हमें “दलित” (कमज़ोर) नहीं बल्कि बहुजन (बहुसंख्यक) बनना होगा।
दलितपन’ एक प्रकार का भीकमँगा-पन बन गया है, जिस प्रकार कोई भिखारी कभी शासक नही बन सकता है, उसी प्रकार बिना अपना ‘दलितपन’ छोड़े कोई समाज शासक नही बन सकता।
कांशी राम ने बहुजन का विचार भी फुले की ‘शुद्रादिअतिशूद्र’ (ओबीसी और एससी) की अवधारणा का विस्तार करके ही हासिल किया. कांशी राम के बहुजन का अर्थ देश की तमाम वंचित जातियां और अल्पसंख्यक हैं, जिनका आबादी में 85% का हिस्सा है।
भारतीय राजनीति के पहले शख्स हैं, जिन्होंने दलितों को शासक बनने का न सिर्फ सपना दिखाय़ा, बल्कि उसे साकार करने का रास्ता भी बताया।
कांशी राम ने पवित्रतावाद की जगह, अवसर को सिद्धांत में तब्दील कर दिया. बीएसपी की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक समय में देश का हर सोलहवां वोटर इस पार्टी के हाथी निशान पर बटन दबा रहा था।
जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए आप को देश का हुक्मरान बनना होगा
आसान नही है कांशी राम बनना।। कांशी राम बनने का मतलब है – नींव की ईट बनना। कांशी राम का मतलब है – पुरी जिंदगी का समर्पण।
हमारे पूर्वजों ने क्या किया और हमारा भविष्य कैसा होना चाहिए? इन दो बातों को ध्यान में रखकर हमे अपने भविष्य के निर्माण के लिए सोचना चाहिए।
जिस काम को उत्तरभारत में गुरु रविदास जी ने किया उसी काम को फुले शाहू आम्बेडकर ने महाराष्ट्र में किया!
हमे हुकुमरान क्यों बनना है..? तब मै उनसे कहेता हु की, हुकुमरान समाज की बहेन-बेटियो की इज्जत नहीं लूटी जाती है.. हुकुमरान समाज पर कभी कोई अत्याचार नहीं कर सकता है.. हुकुमरान समाज के साथ के साथ कोई किसी भी प्रकार का अन्याय नहीं कर सकता।
हुकुमरान बनो.. हुकुमरान बनो..” हुकुमरान बनोगे तब तुम लेने वाले नहीं देने वाले बनोगे.. तभी तुममे आत्म-सन्मान और स्वाभिमान की भावना पनपेगी.. तभी तुम्हारी समस्याओ का समाधान होगा।
मत सोचो की तुम्हारे पास धन नहीं है, इसलिए तुम हुकुमरान नहीं बन सकते.. तुम जरूर हुकुमरान बन सकते हो.. हुकुमरान बन्ने के लिए धन की नहीं वोट की ताकत चाहिए, जो तुम्हारे पास भारी मात्रा में पड़ी है।
डीएम कोई राजा नही है बल्कि तुम्हारा कर्मचारी है, इसलिए उसके चपरासी को धक्का देकर डीएम से मिलो, क्योकि मालिक कभी भी कर्मचारी से मिलने के लिए हाथ जोडकर नही खड़ा होता है।
मैं देश की व्यवस्था को बदलना चाहता हूँ और इस व्यवस्था में परिवर्तन लाना चाहता हूँ। इसी वजह से मैंने शादी नहीं की और नौकरी छोड़ कर घर ना जाने का फैंसला किया है!
मैं दबे कुचले समाज को ज़िल्लत भरी जिंदगी से निकाल कर मान सम्मान वाली ज़िंदगी देकर उसको अपने पैरों पर खड़ा देखना चाहता हूँ।
मेरा यह मानना है की जब तक हम जातीविहीन समाज की स्थापना करने में सफल नहीं हो जाते, तब तक जाती का उपयोग करना होगा अगर ब्राह्मण जाती का उपयोग अपने फायदे के लिए कर सकते है, तो मै उसका इस्तेमाल अपने समाज के हित में क्यों नहीं कर सकता ।
जाती जो की अभी हमें अपने लिए एक समस्या नज़र आती है, अगर हम इसका ठीक तरह से उपयोग करना सिख जाए, तो यह हमारे लिए एक फयदेमंद चीज़ बन सकती है.. आज जो हमारी समस्या है, वो कल हमारे लिए अवसर भी बन सकती है, बशर्ते हम उसे ठीक तरह से इस्तेमाल करना सिख जाए।
मै मात्र इस उम्मीद पर खाली नही बैठा रहूँगा की जाती एक दिन अपने आप समाप्त हो जाएगी, बल्कि जब तक भारतीय समाज मे जाती जिंदा है, तब तक मै इसको अपने समाज के हीत मे इस्तेमाल करता रहूँगा।
अगर यह सभी जातिया आपस मे टूटी रहती है तो सभी अल्पजन रहती है, लेकिन अगर यह जातिया आपस मे भाईचारा पैदा करके संघटित हो जाती है, तो यह बहुजन बन जाती है.. इन लोगो की इस देश मे जनसंख्या 85% है और यह अपने आपमे देश की सबसे बड़ी शक्ति है।
आप जाती का अपने हित मे इस्तेमाल करके राजनैतिक सत्ता की मास्टर चाबी को अपने हाथ मे ले सकते है और अपने समाज को आत्मसम्मान तथा तरक्की की ज़िंदगी मुहैया करा सकते है।
अगर आप शाषक नही बन पाते है, तो हमारी समस्याओ का कोई हाल नही हो सकता है, लेकिन दलित अथवा भिकारी रहते हुए आप शाषक कैसे बन सकते है ? इसलिए आपको अपना “दलितपन” छोड़ना होगा, अगर आप शाषक बन जाते है तो आपकी सभी समस्याओ का हाल आप स्वयं कर सकते है।
आप शासक बनकर ही एक जातिविहिन समाज की स्थापना कर सकतेहै क्योकि शासक ही एक नये समाज का निर्माण कर सकता है।
चमचा एक देसी शब्द है, जिसका प्रयोग उस व्यक्ति के लिए होता है जो अपने आप कुछ नहीं कर सकता बल्कि उससे कुछ करवाने के लिए किसी और की जरूरत होती है.. और वह कोई और व्यक्ति, उस चमचे का इस्तेमाल हमेशा अपने निजी फायदे और भलाई के लिए अथवा अपनी जाती की भलाई के लिए करता है, जो चमचे की जाती के लिए हमेशा अहितकारक होता है।
नकली कार्यकर्ता का इस्तेमाल, असली व् सच्चे नेतृत्व को कमजोर करने के लिए होता है।
आपको जो नौकरी मिली है वह प्रतिनिधित्व के कारण मिली है और प्रतिनिधित्व पुरखों द्वारा चलाये आंदोलन का प्रोडक्ट है.. अर्थात समाज का आपके ऊपर ऋण है और इसलिए आपका सामाजिक उत्तरदायित्व है कि आप अपने समाज को अपना मनी, माइंड, टाइम शेअर करें और समाज के ऋण से उऋण हो।
वोट का अधिकार हमे बिकने के लिए नही, बल्कि गुलामी से मुक्ति के लिए मिला है ।
ज्ञानी चमचे / अम्बेडकरवादी चमचे : ये वो लोग है जो बड़ी- बड़ी बाते करते है बाबासाहेब को पढ़ते और क्वोट भी करते है लेकिन आचरण उसके विपरीत करते है।
महामना फुले के कारण हम लोग पढ़ लिख गए, छत्रपति शाहूजी महाराज के कारण हमे नौकरियों में जाने का मौका मिला और बाबासाहब डॉ आम्बेडकर के कारण जिंदगी के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का मौका मिला है.. इन तीनो महापुरुषों से प्रेरणा लेकर हम अपने में सुधार पैदा करेंगे और मिशन को आगे बढ़ाएंगे।
जिस समाज की शासन और प्रशासन में भागीदारी नही होती, वह समाज जिंदगी के हर पहलू में पिछड़ जाता है.. क्योंकि, शासन और प्रशासन हुकूमत के दो अंग है.. जिस समाज का हुकूमत में हिस्सा नही होता, वह समाज जिंदगी भर दूसरे पहलू में भी अपना हक हासिल नही कर सकता।
मान्यवर कांशी राम जी कहते थे कि मैं बाबा साहब की केवल एक किताब पढ़ कर पागल हो गया और घर बार छोड़कर बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने में लग गया.. पता नहीं यह कैसे अंबेडकरवादी हैं जो बाबा साहेब की इतनी किताबें पढ़कर और उनके विचारों को सुनकर भी टस से मस नहीं होते!!
अवसरवादी लोग है हम, और अवसर का फायदा उठाना अच्छे से जानते है।
आरक्षण कोई रोजी रोटी का मसला नही है, यह देश मे शासन प्रशासन में भागीदारी का मसला है। यदि लोकशाही में लोगो का बराबर हिस्सा नही होता है तो वह प्रजातंत्र सही ढंग से नही चल पाता है। मुल्क की बात आगे नही बढ़ती है, वह पिछड़ जाता है।
इतिहास का रुख बदलने वाले साहसी लोग कठिनाइयों से कभी भी नही घबराया करते, बल्कि उनका डट कर मुकाबला करकर लक्ष्य प्राप्त करते है।
चमचे का इस्तेमाल उसकी अपनी ही जाती के खिलाफ किया जाता है जबकि कार्यकर्ता का इस्तेमाल उसकी जाति की भलाई के लिए होता है।
चमचे का इस्तेमाल सच्चे और खरे नेता को कमजोर करने के लिए होता है, जबकि कार्यकर्ता का
इस्तेमाल सच्चे और खरे नेता की मदद के लिए और उसके हाथ मजबूत करने के लिए होता है।
जब सच्चे और खरे योद्धा होते है, चमचो की मांग तभी होती है।
अल्पसंख्यको ने बहुसंख्यको में से चमचे बनाकर अल्पमत शासन को मजबूत कर लिया है। इस तरह चमचा युग ने भारत मे लोकतंत्र को निरर्थक कर दिया है।
भारत मे हमारी मूल और वास्तविक समस्या सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक है।
जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।
बाबासाहब के बच्चो के बगैर इस देश का शासन नही चलने दूंगा।
मैंने सम्राट अशोक के भारत का सपना देखा है।
मै कोई नेता नहीं हु.. में थोडा ज्यादा काम करता हु इसलिए कार्यकर्ता मुझे बड़ा नेता समझते है।
हमारा लक्ष्य आर्थिक मुक्ति और सामाजिक परिवर्तन का है।
कांशी राम के संकल्पों में था कि जब तक अंबेडकर का सपना पूरा नहीं कर लेता अब वो कभी घर नही आएंगे। पूरी जिन्दगी अपना घर नहीं खरीदेंगे। उनका संकल्प था कि गरीब दलितों का घर ही अब से उनका घर होगा।
वो बुद्ध और आम्बेडकर को अपना सकते है, लेकिन वो कांशी राम को नही अपना सकते है!! अब हमें समझना होगा कि सिर्फ
आम्बेडकरवाद ही नही, बुद्धिज़्म भी कांशी राम साहब के बिना अधूरा है!
1956 के बाद धराशायी हुई आम्बेडकरी विचारधारा की इमारत, कांशी राम नामक मजबूत ईंट की बुनियाद पर फिर से खड़ी हुई है..
बाबासाहब का दूसरा नाम, कांशी राम कांशी राम।
अगर आज हम बाबासाहब को जानते है और उनकी जयंती मना रहे है तो उसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति को जाता है, और वो है बहुजन नायक मान्यवर साहब कांशीराम।
कांशी राम नाम का आदमी पैदा न होता तो अम्बेडकर फिर से जिंदा न होते। क्योंकि अम्बेडकर के विचारों और उनकी विचारधारा दफन होने की कगार पर थी, उसे खतम करने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। लेकिन, कांशी राम ने अम्बेडकर को फिर से जिंदा कर दिया। आज जो हम जय भीम बोलते है वो मान्यवर साहब के कारण।
जिस समाज की शासन और प्रशासन में भागीदारी नही होती, वह समाज जिंदगी के हर पहलू में पिछड़ जाता है.. क्योंकि, शासन और प्रशासन हुकूमत के दो अंग है.. जिस समाज का हुकूमत में हिस्सा नही होता, वह समाज जिंदगी भर दूसरे पहलू में भी अपना हक हासिल नही कर शकता.
अगर अन्याय अत्याचार को रोकना है, तो हमे देश का हुक्मरान बनना होगा.
साहब कांशीराम ने, ऐसे ऐसे लोगो को चुनाव लड़वा दिया, और वो जीत गए, जिन्होंने ने विधानसभा देखना तो दूर उसका नाम भी नही सुना था!! कभी जुते की मरम्मत करनेवाला, तो कभी मिट्टी के बर्तन बनानेवाला.. कभी चरवाहा तो कभी साइकिल के पंक्चर बनानेवाला!!
बाबासाहब कहते हैं कि समानता के अभाव के साथ-साथ हमारे समाज में बंधुत्व का भी अभाव है.. वे पूछते हैं कि हजारों जातियों में बंटे लोगों में बंधुत्व का भाव कैसे पैदा हो सकता है? बाबा साहेब कहते हैं कि “जातियां दरअसल राष्ट्रविरोधी हैं” क्योंकि वे सामाजिक जीवन में भेद पैदा करती हैं..
ये कांशी की बिरासत है, इसे हम को बचाना है!
ये सपना भीम बाबा का, हमे घर घर पहुंचाना है!!
दलालो की दलाली, खत्म कर के ही दम लो तुम
मुझे मालूम है हम को, संसद तक भी जाना है!!

