Thursday, February 26, 2026
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त्याग की प्रतिमूर्ति थी माता रमाबाई अंबेडकर…. सोहन अंबेडकर

मूकनायक/ डॉ रमेश पोडिया

संपादक हरियाणा प्रदेश

आज त्यागमूर्ति माता रमाबाई अम्बेडकर का स्मृति दिवस है। इस उपलक्ष आज बहुजन समाज पार्टी के पूर्व प्रदेश सचिव अधिवक्ता सोहन अम्बेडकर ने मूकनायक पत्रिका के सम्पादक से बात करते हुए रमाबाई अम्बेडकर की पुण्यतिथि पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। सोहन अम्बेडकर ने बताया की 1935 को माता रमाबाई आंबेडकर का परिनिर्वाण हो गया था।माता रमाबाई के स्मृति दिवस पर अक्सर बहुजन लेखक बाबा साहेब का जीवन वर्णन करते समय उनके सघर्षों को बताते समय उनको भीमराव से बाबा साहेब बनाने वाली रमाबाई के योगदान की चर्चा करना भूल जाते हैं।रमाबाई बहुजनों के महानायक डॉ.अम्बेडकर नामक विशाल वृक्ष की मजबूत जड़ थी जो आंधी तूफानों से भरे संघर्ष पूर्ण दिनों में उन्हें अविचल रूप से थामें मजबूती से खड़ी रही।रमाई के मूक बलिदान ने बहुजन आन्दोलन में रक्त प्रवाह का कार्य किया है।रमाई और डा.अम्बेडकर का जीवन आदर्श दाम्पत्य जीवन तो नहीं पर समझदार पति-पत्नी का जीवन तो अवश्य ही कहा जा सकता है।डॉ.अम्बेडकर के पढ़ने की क्षुधा को अपने खून पसीने से एक कर रात-दिन कमा कर एकांकी जीवन जीते हुए उपले पाथते हुए रात-दिन घर में खटते हुए वह रमाई ही थी जिसने डॉ.अम्बेडकर के अन्दर ज्ञान की कभी न मिटने वाली प्यास को धनाभाव के कारण कभी बुझने नहीं दिया।जिस समय रमाबाई का विवाह हुआ उस समय रमाबाई को पढ़ना नहीं आता था।डॉ.अम्बेडकर ने जिस शालीनता से रमाबाई को पढ़ाया रमाबाई ने भी उतनी ही लगन और ईमानदारी से पढ़ना-लिखना सीखा।बहुत कम लोग जानते है कि बाबा साहेब जब विदेश में होते थे तो रमाबाई उनको बराबर पत्र लिखा करती थी और डॉ.अम्बेडकर भी उनको पढ़ाई की भारी व्यस्तता और धनाभाव के बावजूद उन्हें तुरन्त उत्तर दिया करते थे।रमाई अपने अथक प्रयासों एवं परिश्रम से डॉ.अम्बेडकर के बहुजन मुक्ति संघर्ष में जुड़ी रही।अधिकतर लोग यह समझते है कि वह केवल आज्ञाकारी प्रतिव्रता स्त्री और कुशल परिवार चालक थी परन्तु उनके बारे में बहुत कम लोग ये जानते है कि उन्होने डॉ. अम्बेडकर के साथ बहुजन आन्दोलन तथा शोषित-पीड़ित के हितो के लिए कंधें से कंधा मिलाकर काम किया रमाबाई अक्सर डॉ.अम्बेडकर द्वारा किए जा रहे कार्याे पर बातचीत करती व अपनी उचित सलाह दिया करती थी व डॉ.अम्बेडकर उन्हें बहुजन समाज की सभाओं और खासकर शोषित-पीड़ित महिलाओं की सभा में अवश्य ले जाया करते थे।29 जनवरी 1928 मुंबई में रमाबाई को वंचित समाज महिला परिषद में अध्यक्ष पद के लिए चुना गया और उन्होनें अध्यक्ष के पद को बड़ी बखूबी से संभाला।शोषित-पीड़ित वर्ग की बैठकों में रमाबाई जब डॉ. अम्बेडकर के साथ जाती तो बैठकों में आए शोषित-पीड़ित स्त्री-पुरूषों का उत्साह दुगुना हो जाता।इस परिवर्तन को डॉ.अम्बेडकर भी महसूस करते थे।चावदार तालाब यानि महाड़ सत्याग्रह के बाद सौभाग्य सहस्र बुद्धे और रमाबाई अम्बेडकर ने सवर्ण स्त्रियों की तरह वंचित समाज की महिलाओं को साड़ी बांधना सिखाया उन्होंने शूद्रातिशूद्रों के उत्थान लिए बाबा साहेब के अभियान में खूब बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया।नारी उत्थान के लिए रमाई बाबासाहेब के साथ कदम से कदम मिलाकर चली।इतिहास में रमाई को सदैव याद किया जाता रहेगा।

त्यागमूर्ति माता रमाबाई को श्रद्धांजलि कोटि कोटि नमन वंदन विनम्र अभिवादन !

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