मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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हम अक्सर दूसरों के दुखों को देखकर सहानुभूति तो जताते हैं, लेकिन उनके दर्द की वास्तविक गहराई को महसूस नहीं कर पाते। जब तक हमारे पैर में कांटा नहीं चुभता, तब तक हमें दूसरों के छालों का दर्द सिर्फ एक कहानी लगता है। कहते हैं कि ‘जिसके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’। एक अमीर व्यक्ति किसी गरीब की भूख और कड़ाके की ठंड में ठिठुरने की मजबूरी को केवल शब्दों में समझ सकता है, लेकिन उसकी आत्मा उस पीड़ा को तब तक स्वीकार नहीं करती, जब तक वह खुद कभी उस अभाव से ना गुजरे। इसी तरह, असफलता, बीमारी या किसी अपने को खोने का गम क्या होता है, यह वही व्यक्ति पूरी तरह समझ सकता है जिसने खुद उस दौर का सामना किया हो।
यहां यह सत्य है कि स्वयं कठिनाई का अनुभव करने पर मनुष्य के भीतर का अहंकार नष्ट हो जाता है और उसकी जगह ‘सच्ची करुणा’ ले लेती है। व्यक्तिगत अनुभव हमारे दृष्टिकोण को व्यापक बनाता है। यह हमें संवेदनशील बनाता है ताकि हम दूसरों के प्रति अधिक दयालु और मददगार बन सकें।
एक आदर्श और संवेदनशील समाज के निर्माण के लिए यह बेहद जरूरी है कि हम केवल अपने अनुभवों तक सीमित ना रहें। यदि हम दूसरों की परिस्थितियों में खुद को रखकर देखना सीख लें, तो बिना खुद संकट में पड़े भी हम दूसरों की मदद कर सकते हैं। अंततः, जीवन का असली मूल्य दूसरों के अनकहे दर्दों को समझने और उन्हें बांटने में ही है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

