मूकनायक/सुरेश सिंह बौद्ध
जालौर/ राजस्थान
जालौर। लोक देवता बाबा रामदेव जी के इतिहास और उनके सामाजिक पक्ष को लेकर मूक नायक सुरेश सिंह बौद्ध (जालौर) और गोपाल परमार द्वारा एक बड़ा दावा किया गया है। उन्होंने बाबा रामदेव जी को ‘अवतारवाद का शिकार’ बताते हुए कहा कि वे मेघवाल समाज में जन्मे एक महान क्रांतिकारी थे, लेकिन बाद के कालखंड में उन्हें अवतार साबित करने का झूठा प्रचार किया गया।
सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश सिंह बौद्ध और गोपाल परमार ने कई गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि बाबा रामदेव जी को अवतार साबित करने के पीछे सबसे बड़ा हाथ हरजी भाटी का है, जबकि ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार हरजी भाटी का जन्म बाबा रामदेव जी के समाधि लेने के ठीक 303 साल बाद हुआ था।
आरती और भजनों के तथ्यों पर उठाए सवाल
गोपाल परमार और सुरेश सिंह बौद्ध ने बताया कि आज मंदिरों में गाई जाने वाली प्रसिद्ध आरती “पिछ्म धरा छु म्हारा पिर जी पधारेया, घर अजमल अवतार लियो… हरी री आरती हरजी भाटी चँवर ढोले” पूरी तरह विरोधाभासी है। जब हरजी भाटी का जन्म बाबा रामदेव जी के 303 साल बाद हुआ, तो वे लाछा और सुगना के साथ चँवर कैसे ढोल सकते हैं? इसके अलावा, इस पूरी आरती में बाबा की अनन्य भक्त और बहन डाली बाई का नाम तक शामिल नहीं किया गया, जो कि सीधे तौर पर वैचारिक भेदभाव को दर्शाता है।
250 सालों तक क्यों नहीं बने उच्च जाति के लोग अनुयायी?
बयान में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि बाबा रामदेव जी कथित रूप से ‘तंवर’ (उच्च जाति) के थे, तो उनकी समाधि के 250 सालों बाद तक उच्च जाति के लोग उनके अनुयायी क्यों नहीं बने? हरजी भाटी के कालखंड से पहले किसी भी प्राचीन भजन या वाणी में बाबा को अवतार मानने का उल्लेख नहीं मिलता है। इतिहास गवाह है कि सुगना बाई के ससुराल वाले भी बाबा से नफरत करते थे और उनके अनुयायी मेघवाल समाज के लोगों को ‘बाबा रा रिखिया’ कहा जाता था।
1950 से पहले शिक्षा पर प्रतिबंध का उठाया फायदा
गोपाल परमार ने कहा कि वर्ष 1950 से पहले अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लोगों पर शिक्षा की पाबंदियां थीं। अशिक्षित होने के कारण तत्कालीन समाज इस अवतारवाद के झूठे प्रचार का विरोध नहीं कर सका। लेकिन मेघवाल समाज के मौखिक गायकों और पारंपरिक भजन वाणियों ने बाबा के जन्म के असली सच को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा।
कोर्ट केस और ऐतिहासिक ग्रंथों का हवाला
बयान में आगे कहा गया है कि इन ऐतिहासिक प्रमाणों और सत्य को उजागर करने का काम सतगुरु रामप्रकाश जी ने किया। उन्होंने बाबा रामदेव जी पर ‘सत्य ग्रंथ’ लिखा और जोधपुर कोर्ट से इस संबंध में मुकदमा भी जीता। कोर्ट में यह साबित किया गया कि बाबा रामदेव जी का जन्म मेघवाल समाज में हुआ था, उनके पिता का नाम सायर जी जयपाल व माता का नाम मँगनी देवी था और डाली बाई उनकी सगी बहन थीं। आज के आधुनिक इतिहासकार भी इस सत्य को प्रमुखता से उजागर कर रहे हैं।

