Thursday, February 26, 2026
Homeदेशबहुजनों के कान्वेंट ग्रेजुएट एडवोकेट

बहुजनों के कान्वेंट ग्रेजुएट एडवोकेट

मूकनायक /देश

“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”

⏰⏰ कुछ समय से हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट आरक्षण को लेकर जो फैसले दे रहा है इससे भारत का शहरी बैकवर्ड क्लास काफी दुखी और चिंतित नजर आ रहा है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि उसे ऐसा लगता है कि उसके संवैधानिक अधिकार समाप्त किए जा रहे है वैसे इसके सोचने का जो नजरिया है उसके हिसाब से संवैधानिक अधिकार से मतलब सिर्फ आरक्षण/ प्रतिनिधित्व है । हमें याद रखना है ।

*💎💎बाबा साहेब डॉ अंबेडकर ने 18 मार्च 1956 को आगरा के राम लीला मैदान में रोते हुए कहा था कि 👉”मुझे मेरे समाज के पड़े लिखे लोगों ने धोखा दिया , मैंने सोचा था कि ये लोग पड़ लिख कर अपने गरीब समाज की सेवा करेंगे लेकिन मै देख रहा हूं कि मेरे इर्द गिर्द ” व्हाइट कलर बाबुओं ” की भीड़ इकट्ठी हो गई है जो सिर्फ और सिर्फ अपना पेट भरने में लगी है । इसको समाज से कोई लेना देना नहीं है। “

कहीं हमारे साथ जो हो रहा है वो हमारी किसी चूक या भूल का परिणाम तो नहीं है बाबा साहेब की भावना के तहत हमने सामाजिक काम किया, अफसर बनने के बाद या नहीं किया। यह भी चिंतन करना चाहिए, बिना किसी स्वार्थ के।*

👱‍♂️👱‍♂️कुछ समय से कुछ लोग अधिकारी, वकीलों का ग्रुप अथवा संगठन व समूह बनाने की बात कर रहे है वह ये भी कह रहे की हमारे समाज के बच्चो को इस क्षेत्र में जाना चाहिए।
हमारे समाज के जो आज वकील है पहले तो हम ये जान लें वो कौन लोग है???????

💎💎90 के दशक तक हमारे समाज के बच्चो को सरकारी नौकरी मिलना कुछ आसान था लेकिन 1992 में कांग्रेस की सरकार में ग्लोबलाइजेशन का दौर शुरू हुआ यानी सरकारी नौकरियों में कटौती और निजीकरण की शुरुआत। हमारे समाज में भी दो तरह के विद्यार्थी है जो पढ़ रहे है एक गांव के सरकारी स्कूल में दूसरा शहर के कान्वेंट स्कूल में । जगह कम होने के कारण शहर में रहने वाले बच्चे तो सलेक्ट होते गए लेकिन गांव के बहुजन बच्चे बेरोजगार होने लगे क्योंकि उनकी शिक्षा में बहुत बड़ा अंतर था। उसमें जो बच्चे अच्छे थे शहर में रहकर कुछ करने की इच्छा थी ऐसे बच्चे ही ज्यादातर वकालत के पेशे में आए। आज देश भर में डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश बहुजन समाज के वकील इसी बैकग्राउंड से है। यानी गांव के सरकारी स्कूल के पढ़े हुए। इसमें 90 प्रतिशत वकील ऐसे है जो 10 दिन कोर्ट ना जाए तो सोचना पड़ता है कि खर्च के लिए किससे उधार लिया जाए। और समाज उनसे उम्मीद करता है की वो समाज के केस भी फ्री या सस्ते में लड़े और बाबा साहेब के मिशन में काम भी करे। क्या ये व्यहारिक है। हिंदी मीडियम से पढ़ कर आए लोग जितना कर रहे है क्या वो कम है ???? हमारे समाज के बड़े बड़े अफसर जो बड़े बड़े शहरों में रहते है उनके बच्चे शहर के बड़े बड़े कान्वेंट स्कूलों में पड़ते है । समाज में ऐसे अफसरों कि संख्या लाखो में है देश भर में। वकील बनाने के लिए पांच वर्ष और तीन वर्ष का कोर्स है। अगर ये अफसर अपने एक एक बच्चे को वकील बनाने का निर्णय कर ले तो तीन से पांच साल के अंदर देश के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बहुजन समाज के कान्वेंट एजुकेटेड लाखों वकील होंगे जो अपने साथ साथ पूरे समाज के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होंगे। और बाद में यही वकील हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बनेगे। वैसे भी आने वाले समय में सरकारी नौकरियों का कोई भरोसा नहीं है । लेकिन क्या बहुजन समाज के अफसर ऐसा करेंगे ये बड़ा सवाल है ??????????

🟢मेरा मानना है कि यदि आज बहुजन समाज के अफसर जिनके बच्चे अच्छे कान्वेंट स्कूलों में पड़ रहे है वो अपने बच्चो को वकील बनाने का फैसला करे तो निश्चित रूप से इस देश के संविधान और लोकतंत्र दोनों को बचाया का सकता है। फैसला हमें करना है किसी और को नहीं। सही समय पर सही निर्णय ही किसी समाज को सफल बना सकता है। आज यही समय की मांग है आइए सोचे और विचार करे। हमारे आज के निर्णय पर ही भारत के लोकतंत्र का भविष्य टिका है ।
धन्यवाद
लेखक ::🅰️🅿️ सिंह
जय भीम जय भारत जय संविधान

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments