Thursday, February 26, 2026
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प्रचलित कुप्रथाएं व रीति रिवाज हैं परिवार व समाज की बर्बादी का कारण

मूकनायक
देश

राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा

✍🏻 समाज में प्रचलित अनेकों ऐसी कुप्रथाओं के चलते आज समाज इतना जर्जर हो गया है कि सहज रूप में जीवनयापन करना भी चुनौती बन गया है। पारिवारिक व सामाजिक जिम्मेदारियों की बात करें तो बच्चों की मंहगी पढ़ाई, उनका विवाह करने जैसी चिंताएं माता पिता को परेशान कर रही हैं। मंहगाई व बेरोजगारी के चलते दहेज़ और सामाजिक कुप्रथाओं के चक्कर में गरीब व मध्यम वर्गीय परिवार सक्षमता से अधिक अपनी जीवनभर की गाढ़ी कमाई खर्च करने में विवश हो रहे हैं।
यहां यह विडम्बना ही है कि देश के शिक्षित लोग भी एक दूसरे को देखकर जातिगत व अंधविश्वास के आयोजन, मुण्डन, जनेऊ व मृत्युभोज आदि के आयोजनों में खर्च करके मेहनत की कमाई बर्बाद कर रहे हैं । विवेक का ऐसे हालात में परास्त होना आम बात है । आम इंसान इन कुरुतियों से छुटकारा भी पाना चाहता है । समझने और स्वयं विचार करने पर इंसान को खुद भी अपनी बुराई का अहसास हो जाता है । अतः बर्बादी से बचने के लिए इन कुप्रथाओं व रिवाजों के पीछे भागने से पूर्व गहन विचार अवश्य करें
लेखक:
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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