मूकनायक/ देश
“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”
आजादी की लड़ाई में दलित वीरांगनाओं एक नहीं सैकड़ों महिलाओं ने सूली पर चढ़कर अपनी जान गवा दी ।दलित महिलाओं की भी एक सैन्य टुकड़ी थी ।जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। जिसकी लीडर थी उदा देवी थी।
घटना 16 नवंबर 1857 की है। स्थान था लखनऊ का सिकंदर बाग ।एक पीपल का पेड़ के नीचे से गुजरती हुई ईस्ट इंडिया कंपनी के एक सैनिक को अचानक गोली लगी और वह गिर गया। फिर दूसरा और तीसरा सैनिक गिरा। और कोई भी सैनिक आगे बढ़ता तो उसे गोली से उड़ा दिया जाता।
देखते देखते ढेर होते सैनिकों की संख्या 36 तक पहुंच गई। पूरी टुकड़ी में खलबली मच गई ।टुकड़ी के कमांडर कालीन कैंपबेल इस बात के लिए हैरान थे कि सैनिकों पर गोली कहां से चलाई जा रही है। डॉक्टर ने बताया कि गोलियां ऊपर से नीचे की तरफ आती दिख रही है। शायद आसमान से गोलियां बरस रही हैं। यह सुनते ही कैंपबेल ने सैनिकों को पीपल के पेड़ के ऊपर गोलाबारी करने का आदेश दिया। और ऊपर से एक लहूलुहान स्त्री जमीन पर आ गिरी ।इसी स्त्री ने तीन दर्जन सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया ।और शहीद होकर जमीन पर गिरी। वीरांगना का नाम था उदा देवी। जो दलित पासी समाज से थी।
पासी समाज के हर एक व्यक्ति को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट/criminal Tribes Act द्वारा अंग्रेजों ने अपराधी घोषित कर रखा था। अपने पति के शहीद होने के बाद अवध की बेगम हजरत महल से मिलकर उदा देवी ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए दलित महिलाओं की एक सैनिक टुकड़ी बनाई थी । और अपनी वीरता के जौहर दिखाए थे।
हाथ में राइफल लिए हुए ,आत्मविश्वास के साथ चलने की मुद्रा में, लखनऊ के सिकंदर बाग में उनकी मूर्ति लगी है ।यहां 16 नवंबर को हर वर्ष मेला लगता है ।यहां बड़ी संख्या में मेले में दलित और अन्य समाज के लोग आते हैं। उदा देवी को शत-शत नमन ।
लेखक :मोती राम MA
पूर्व अधिकारी
SHAHDARA

