मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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यह मानव जीवन का एक कड़वा लेकिन शाश्वत सत्य है कि मनुष्य की पसंद और नफरत काफी हद तक उसके खुदगर्ज और स्वार्थी स्वभाव से तय होती है। हम जिसे अपना कहते हैं, जिससे प्रेम करते हैं या जिससे घृणा करते हैं, उन सभी भावनाओं के केंद्र में कहीं ना कहीं हमारा ‘स्वार्थ’ छिपा होता है। जब कोई व्यक्ति हमारी इच्छाओं, उम्मीदों और हितों को पूरा करता है, तो वह हमें पसंद आने लगता है। इसके विपरीत, जैसे ही कोई हमारे स्वार्थ के आड़े आता है या हमारे अहम को ठेस पहुँचाता है, वह हमारी नफरत का पात्र बन जाता है। संसार का नियम है कि यहाँ रिश्ते अक्सर भावनाओं से कम और सहूलियत से ज्यादा चलते हैं।
यहां यह सत्य है कि एक व्यक्ति जो आज हमारा सबसे प्रिय मित्र है, यदि वह कल हमारी मदद करने से इनकार कर दे, तो हमारी पसंद नफरत में बदलते देर नहीं लगती। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारी पसंद का पैमाना सामने वाले की अच्छाई नहीं, बल्कि उससे मिलने वाला हमारा अपना फायदा या मानसिक संतोष है। हमारी नफरत भी अक्सर तब जनमती है, जब हमें किसी से असुरक्षा, ईर्ष्या या अपने स्वार्थ की हानि होने का डर होता है। देखा जाए तो पसंद और नफरत केवल दो मानसिक स्थितियां हैं, जिनका रिमोट कंट्रोल इंसान के स्वार्थ के हाथ में होता है। हम दुनिया को वैसे नहीं देखते जैसी वह है, बल्कि वैसे देखते हैं जैसा हमारा स्वार्थ हमें दिखाता है। इस खुदगर्ज स्वभाव से ऊपर उठकर जब हम निष्पक्ष होकर देखना शुरू करते हैं, तभी हम सच्ची मानवता को समझ सकते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

