BTMC एक्ट 1949 को निरस्त करने की मांग पर संविधान क्लब में राष्ट्रीय बैठक; देशभर के बौद्ध संगठन, सामाजिक प्रतिनिधि और जनप्रतिनिधि करेंगे मंथन
मूकनायक समाचार | सत्यशील गोंडाने-/ बालाघाट -/(मध्यप्रदेश )
बालाघाट। विश्वभर के बौद्ध अनुयायियों की आस्था के प्रमुख केंद्र महाबोधि महाविहार, बोधगया के प्रबंधन को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस अब एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर तेज होती दिखाई दे रही है। बोधगया टेम्पल मैनेजमेंट कमेटी एक्ट 1949 (BTMC Act) को निरस्त करने और महाबोधि महाविहार के प्रबंधन में बौद्ध अनुयायियों की निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करने की मांग को लेकर 5 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के संविधान क्लब में राष्ट्रीय बैठक आयोजित की जा रही है।
महाबोधि महाविहार बोधगया मुक्ति आंदोलन राष्ट्रीय समिति के अनुसार, बैठक में देश के विभिन्न हिस्सों से बौद्ध संगठनों, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ जनप्रतिनिधि और संविधानवादी विचारधारा से जुड़े लोग शामिल होंगे। बैठक में आंदोलन की अब तक की स्थिति की समीक्षा के साथ आगामी रणनीति पर भी चर्चा की जाएगी।
1895 से उठ रही प्रबंधन अधिकार की मांग का दावा
महाबोधि महाविहार बोधगया मुक्ति आंदोलन समिति मध्यप्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. एडवोकेट संजय खोबरागड़े ने कहा कि महाबोधि महाविहार का इतिहास बौद्ध धर्म की वैश्विक विरासत से जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार, महाविहार के प्रबंधन को बौद्ध अनुयायियों के हाथों में सौंपने की मांग का इतिहास एक सदी से भी अधिक पुराना है।
समिति ने अपने बयान में श्रीलंका निवासी बौद्ध मिशनरी अनागारिक धम्मपाल के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा है कि उन्होंने महाबोधि महाविहार के प्रबंधन को बौद्ध अनुयायियों को दिलाने के लिए कानूनी और सामाजिक स्तर पर प्रयास किए थे। समिति के अनुसार, वर्ष 1895 में तत्कालीन कलकत्ता न्यायालय में भी इस संबंध में कानूनी पहल की गई थी।
आंदोलन समिति का कहना है कि स्वतंत्रता के बाद भी यह अपेक्षा बनी रही कि महाबोधि महाविहार का प्रबंधन बौद्ध समुदाय को सौंपा जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
BTMC एक्ट 1949 बना आंदोलन का मुख्य मुद्दा
आंदोलन की मौजूदा रणनीति का केंद्र BTMC Act 1949 है। समिति का कहना है कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था में महाबोधि महाविहार के प्रबंधन में बौद्ध समुदाय को पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं है। इसी कारण संगठन इस अधिनियम को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं।
समिति के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में बौद्ध और गैर-बौद्ध सदस्यों के साथ जिला कलेक्टर की पदेन अध्यक्ष के रूप में भूमिका है। आंदोलनकारी संगठन चाहते हैं कि महाबोधि महाविहार के धार्मिक स्वरूप और बौद्ध समुदाय की आस्था को ध्यान में रखते हुए इसके प्रबंधन की व्यवस्था में बदलाव किया जाए।
यह मांग अब केवल स्थानीय स्तर का विषय नहीं रह गई है। आंदोलनकारी संगठन इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की तैयारी में हैं।
2018 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का दावा
समिति के अनुसार, महाबोधि महाविहार के प्रबंधन से संबंधित मामला न्यायिक स्तर पर भी उठाया गया है। संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भदंत धम्म शिखर जी द्वारा वर्ष 2018 में इंटरवेंशन पिटीशन क्रमांक 91048/2018 प्रस्तुत किए जाने की जानकारी दी गई है।
समिति का कहना है कि इसके बाद भी संबंधित अधिवक्ता के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में निर्धारित पेशियों पर प्रतिनिधित्व किया जाता रहा है।
आंदोलन समिति के लिए न्यायिक प्रक्रिया और सड़क पर चल रहा आंदोलन, दोनों ही इस अभियान के महत्वपूर्ण पक्ष बताए जा रहे हैं।
पटना की भूख हड़ताल के बाद मुख्यमंत्री से मुलाकात
महाबोधि महाविहार प्रबंधन के मुद्दे को लेकर आंदोलनकारियों ने हाल के दिनों में बिहार में भी सक्रियता बढ़ाई। समिति के अनुसार, 23 अगस्त 2026 से पटना में पांच दिवसीय भूख हड़ताल शुरू की गई थी।
समिति का दावा है कि आंदोलन शुरू होने के पहले ही दिन बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आंदोलनकारियों के प्रतिनिधिमंडल को मुलाकात के लिए आमंत्रित किया। प्रतिनिधिमंडल में राष्ट्रीय अध्यक्ष भदंत प्रज्ञाशील, राष्ट्रीय महासचिव डॉ. आकाश लामा, भंते सुनीत पाल थेरो और अन्य प्रतिनिधियों के शामिल होने की जानकारी दी गई है।
समिति के अनुसार, मुख्यमंत्री से मुलाकात के दौरान महाबोधि महाविहार के प्रबंधन और BTMC Act को लेकर संगठन की मांग रखी गई। समिति का कहना है कि मुख्यमंत्री ने इस विषय पर सरकार की ओर से प्राथमिकता से विचार करने का आश्वासन दिया, जिसके बाद भूख हड़ताल समाप्त कर दी गई।
हालांकि आंदोलन समिति का आरोप है कि आश्वासन के बाद अभी तक उसकी मांग पर अपेक्षित ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
अब दिल्ली की बैठक पर टिकी नजर
मध्यप्रदेश में आंदोलन समिति के प्रदेश प्रवक्ता रवि पटले ने कहा कि संगठन लगातार लोकतांत्रिक और संवैधानिक माध्यमों से अपनी मांग उठा रहा है। उनका कहना है कि यदि सरकार की ओर से महाबोधि महाविहार के प्रबंधन को लेकर ठोस पहल नहीं होती है तो आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर और व्यापक किया जा सकता है।
इसी क्रम में 5 अक्टूबर को दिल्ली के संविधान क्लब में होने वाली बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बैठक में बौद्ध संगठनों के प्रतिनिधियों के अलावा सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों, संसद और विधानसभा से जुड़े बौद्ध प्रतिनिधियों तथा संविधानवादी विचार रखने वाले लोगों की भागीदारी प्रस्तावित है।
क्या दिल्ली से निकलेगा आंदोलन का अगला रास्ता?
बोधगया महाविहार प्रबंधन का मुद्दा अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां आंदोलनकारी संगठन अपनी मांग को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक मजबूती से उठाने की तैयारी में हैं। एक ओर समिति BTMC Act 1949 को निरस्त करने की मांग पर कायम है, वहीं दूसरी ओर सरकार की ओर से इस मुद्दे पर भविष्य में क्या कदम उठाया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
5 अक्टूबर की बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी मंच से आंदोलन की अगली दिशा तय होने की संभावना है। क्या आंदोलनकारी संगठन सरकार से संवाद की राह आगे बढ़ाएंगे, कानूनी विकल्पों पर जोर देंगे या देशव्यापी आंदोलन की घोषणा करेंगे—इसका संकेत बैठक के बाद मिल सकता है।
महाबोधि महाविहार बौद्ध धर्म की वैश्विक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे में इसके प्रबंधन से जुड़ा प्रश्न केवल किसी एक संगठन की मांग तक सीमित नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत, कानूनी व्यवस्था और प्रशासनिक प्रबंधन—इन सभी पहलुओं से जुड़ा विषय है। दिल्ली की राष्ट्रीय बैठक में इन सभी पक्षों पर होने वाली चर्चा पर अब बौद्ध समाज और सामाजिक संगठनों की नजर रहेगी।

