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जिला स्तरीय प्रमाण-पत्र सत्यापन समिति को जाति प्रमाण-पत्र निरस्त करने का अधिकार नहीं: हाईकोर्ट
मूकनायक
कमलेश लवहात्रै छत्तीसगढ़ प्रभारी
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि जिला स्तरीय प्रमाण-पत्र सत्यापन समिति को पहले से जारी जाति प्रमाण-पत्र को निरस्त करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने एर्राबोर के प्राचार्य के. यशवंत रामा के जाति प्रमाण-पत्र को निरस्त करने संबंधी जिला स्तरीय समिति के आदेश को रद्द कर दिया।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कहा कि छत्तीसगढ़ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग सामाजिक प्रास्थिति के प्रमाणीकरण का विनियमन अधिनियम, 2013 के अनुसार जिला स्तरीय सत्यापन समिति किसी भी जाति प्रमाण-पत्र को सीधे निरस्त नहीं कर सकती। यदि किसी प्रमाण-पत्र पर संदेह हो या शिकायत प्राप्त हो, तो समिति को आवश्यक दस्तावेजों के साथ प्रकरण को उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति को भेजना चाहिए।
///वर्ष 1992 में जारी हुआ था प्रमाण-पत्र///
याचिकाकर्ता के. यशवंत रामा की ओर से अधिवक्ता लवकुमार रामटेके ने पैरवी करते हुए कोर्ट को बताया कि वर्ष 1992 में तहसीलदार भोपालपट्टनम, जिला बस्तर द्वारा उन्हें मन्नेवार अनुसूचित जाति का जाति प्रमाण-पत्र जारी किया गया था। इसी प्रमाण-पत्र के आधार पर वर्ष 2002 में उन्हें शिक्षा विभाग में नौकरी मिली और तब से वे आरक्षित वर्ग के अंतर्गत सेवा लाभ प्राप्त करते आ रहे हैं।
उन्होंने बताया कि आंध्रप्रदेश सीमा से लगे क्षेत्र में भाषाई उच्चारण के कारण कई स्थानों पर “मन्नेवार” को “मन्नेपोड” भी लिखा गया है। बस्तर क्षेत्र में इस जाति के लोग निवास करते हैं।
////नृजातीय अध्ययन भी नहीं हुआ///
मामले में यह भी सामने आया कि आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, रायपुर द्वारा मन्नेवार (मन्नेपोड) जाति के नृजातीय अध्ययन का कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है। इसलिए इस जाति के प्रमाण-पत्र को सीधे गलत या फर्जी नहीं माना जा सकता।
////हाईकोर्ट की टिप्पणी///
हाईकोर्ट ने कहा कि जिला स्तरीय समिति के पत्र से ही स्पष्ट है कि स्वयं समिति को भी इस जाति को लेकर संदेह है। ऐसे में समिति को प्रमाण-पत्र निरस्त करने का अधिकार नहीं है।
///शिकायतकर्ता को भी जिम्मेदारी///
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि केवल शिकायत करके किसी व्यक्ति को परेशान करना उचित नहीं है। शिकायतकर्ता को भी अपने आरोपों को प्रमाणित करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने मामले में शासन द्वारा किसी भी प्रकार की वैधानिक कार्यवाही पर फिलहाल रोक लगा दी है।
यह फैसला जाति प्रमाण-पत्र से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इससे स्पष्ट होता है कि जिला स्तर की समिति सीधे प्रमाण-पत्र निरस्त नहीं कर सकती, बल्कि उसे उच्च स्तरीय जांच समिति के पास मामला भेजना होगा।


