मूकनायक /राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मनुष्य स्वाभाविक रूप से अच्छे ही होते हैं, लेकिन जीवन की चुनौतियां, संघर्ष और न्यायपूर्ण या अनुचित परिस्थितियां उन्हें बुरे कार्य करने के लिए मजबूर कर सकती हैं, जिन्हें समाज “बुरा” मानता है। मनुष्य में करुणा, सहानुभूति और सही-गलत को समझने की स्वाभाविक क्षमता होती है। बच्चे, अपने सबसे शुद्ध रूप में, स्वार्थ या द्वेष के बिना कार्य करते हैं, उनमें “बुराई” जन्मजात नहीं होती, बल्कि यह जीवन के अनुभवों और सामाजिक प्रभावों का एक परिणाम है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति मूल रूप से अपना जीवन सम्मान और खुशी के साथ जीना चाहता है और अक्सर जब ये बुराई के लक्षण बाधित होते हैं तो संघर्ष उत्पन्न होता है। परिस्थितियां कई रूप ले सकती हैं जिसमें गरीबी, अन्याय, आघात, भेदभाव या अपने प्रियजनों की रक्षा करने की तीव्र आवश्यकता शामिल है।
जब जीवन की बुनियादी ज़रूरतें (भोजन, आश्रय, सुरक्षा) पूरी नहीं होतीं, तो गरीब इंसान के लिए जीवित रहने की वृत्ति हावी हो जाती है। एक भूखा व्यक्ति चोरी कर सकता है । यह कार्य तकनीकी रूप से “बुरा” है, लेकिन इसका मूल कारण नैतिक विफलता नहीं, बल्कि निराशा और अभाव है। कोई इंसान बुरा नहीं होता, परिस्थितियां उसको बुरा बना देती हैं। यह कहावत हमें निर्णय लेने में अधिक सहानुभूतिपूर्ण और समझदार होने के लिए प्रोत्साहित करती है। यदि हम समाज में “बुराई” को कम करना चाहते हैं तो हमें व्यक्तियों को दंडित करने के बजाय उन परिस्थितियों को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो उन्हें गलत रास्ते पर ले जाती हैं। एक अधिक न्यायपूर्ण, समान और सहायक वातावरण बनाकर, हम मानव स्वभाव में निहित अच्छाई को पनपने का बेहतर मौका दे सकते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

