


धम्मिक चेतना और ऐतिहासिक विरासत का संगम
(एक ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक शोध रिपोर्ट)
लेखक : सम्यकजीवी आज़ाद बौद्ध
प्रस्तावना
उत्तराखंड की पावन धरा, जिसे प्राचीन काल में बुद्ध भूमि के रूप में जाना जाता था, अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ गहन ऐतिहासिक और धम्मिक विरासत के लिए भी विख्यात रही है। इसी भूभाग के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित काशीपुर नगर, जिसे प्राचीन ग्रंथों में गोविषाण कहा गया है, आज पुनः बौद्ध चेतना और शांति संदेश का केंद्र बनकर उभर रहा है।

वर्ष 2023 में काशीपुर से दिल्ली तक प्रारंभ हुई ‘विश्व शांति संदेश पद यात्रा’ केवल एक पदयात्रा नहीं, बल्कि गोविषाण बुद्ध स्तूप के नीचे दबी उस महान बौद्ध सभ्यता की खोज, संरक्षण और पुनर्स्थापना का सामूहिक आह्वान है, जिसका उल्लेख सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने किया था।

यह शोध रिपोर्ट 2023, 2024 और 2025 में आयोजित पद यात्राओं की उपलब्धियों, गोविषाण बुद्ध स्तूप के ऐतिहासिक क्रम, तथा हालिया पुरातात्विक उत्खननों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
विश्व शांति संदेश पद यात्रा (2023–2025) : एक विश्लेषण
वर्ष 2023 : प्रारंभ और जनजागरूकता
वर्ष 2023 में यात्रा का मुख्य उद्देश्य काशीपुर स्थित उपेक्षित गोविषाण बुद्ध स्तूप की ऐतिहासिक महत्ता की ओर शासन और समाज का ध्यान आकर्षित करना था। तराई क्षेत्र के गांवों से गुजरते हुए पदयात्रियों ने “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के बुद्ध संदेश का व्यापक प्रचार किया।

इस यात्रा ने पहली बार गोविषाण को राष्ट्रीय विमर्श में स्थापित किया और जनमानस में अपनी धरोहर के प्रति नई चेतना का संचार किया। यात्रा का समापन 26 अलीपुर रोड, दिल्ली में किया गया, जिसे ऐतिहासिक रूप से बौद्ध आंदोलन और सामाजिक चेतना से जोड़ा गया।
वर्ष 2024 : पुरातात्विक पुनर्जागरण
वर्ष 2024 की यात्रा उस समय निर्णायक सिद्ध हुई जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने गोविषाण टीले पर नवीन उत्खनन प्रारंभ किया। खुदाई में प्राप्त गुप्तकालीन संरचनाओं, दीवारों और ईंटों ने यह प्रमाणित किया कि गोविषाण बौद्ध शिक्षा, वास्तुकला और शासन का एक प्रमुख केंद्र रहा है।

इस चरण में यात्रा ने केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि पुरातात्विक प्रमाणों के साथ ऐतिहासिक दावे प्रस्तुत किए, जिससे काशीपुर की तुलना सारनाथ और कुशीनगर जैसे स्थलों से की जाने लगी।
वर्ष 2025 : अंतरराष्ट्रीय विस्तार
वर्ष 2025 तक यह पद यात्रा अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी। भारत-भूटान के धम्मिक संबंधों के अंतर्गत थिम्पू में आयोजित Global Peace Prayer Festival से इस यात्रा का वैचारिक संगम हुआ। तथागत बुद्ध के पवित्र अवशेषों का सद्भावना संदेश वैश्विक स्तर पर शांति की अवधारणा को सुदृढ़ करता है।

गोविषाण बुद्ध स्तूप : नामकरण और भौगोलिक स्थिति
प्राचीन गोविषाण नगर, वर्तमान काशीपुर से लगभग एक किलोमीटर पूर्व, ढेला (प्राचीन सुवर्णभद्रा) नदी के तट पर स्थित है। यह स्थान हिमालय की तलहटी और गंगा के मैदानों को जोड़ने वाला एक प्रमुख व्यापारिक एवं सांस्कृतिक केंद्र था।
ह्वेनसांग ने इसे Kiu-pi-shwang-na कहा है और इसकी समृद्धि, शिक्षा एवं धार्मिक वातावरण का विस्तृत वर्णन किया है।
द्रोण की भूमिका और बुद्ध स्तूप की स्थापना
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनके पवित्र अवशेषों के वितरण में उत्पन्न विवाद को द्रोण ने शांतिपूर्ण मध्यस्थता से हल किया। उन्होंने अवशेषों को आठ भागों में विभाजित किया और स्वयं को प्राप्त पात्र, बाल और नाखून लेकर गोविषाण आए।
यहीं उन्होंने बुद्ध स्तूप की स्थापना की। उनकी स्मृति में निर्मित द्रोण सागर आज भी गोविषाण बुद्ध स्तूप के समीप विद्यमान है, जो शांति और विवेक का प्रतीक है।
ऐतिहासिक महत्ता : कुणिंद से गुप्त और हर्ष काल तक
दूसरी शताब्दी में कुणिंद शासकों से लेकर गुप्त साम्राज्य और हर्षवर्धन के शासनकाल तक गोविषाण एक समृद्ध राजधानी रहा। ह्वेनसांग के अनुसार यहाँ—
लगभग 100 बौद्ध मठ
10,000 से अधिक भिक्षु
200 फीट ऊँचा अशोक स्तूप
बुद्ध के प्रवास स्थल
विद्यमान थे, जो इसे नालंदा जैसे महान शिक्षाकेंद्रों की श्रेणी में स्थापित करते हैं।
आधुनिक पुरातत्व और ASI का योगदान
1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम ने काशीपुर को प्राचीन गोविषाण के रूप में पहचाना
1965–66 और 1970–71 : प्रारंभिक ASI उत्खनन
2002–2005 : धर्मवीर शर्मा के नेतृत्व में किलेबंदी और स्तूप संरचनाओं का अनावरण
2024 : गुप्तकालीन वास्तुकला की पुष्टि करने वाले नवीन अवशेष
इन खोजों ने गोविषाण को भारत के प्रमुख बौद्ध पुरातात्विक स्थलों की पंक्ति में खड़ा कर दिया।
बौद्ध सर्किट में शामिल होना : सामुदायिक संघर्ष की विजय
उत्तराखंड सरकार द्वारा गोविषाण को बौद्ध सर्किट में शामिल करना स्थानीय बौद्ध समुदाय के वर्षों के प्रयासों का परिणाम है। काशीपुर और नैनीताल क्षेत्र के उपासक-उपासिकाओं की संगठित भूमिका ने इस धरोहर को वैश्विक मान्यता दिलाई।


निष्कर्ष
गोविषाण केवल ईंट-पत्थरों का टीला नहीं, बल्कि शांति, करुणा, ज्ञान और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है।
विश्व शांति संदेश पद यात्रा (2023–2025) ने यह सिद्ध किया है कि जब इतिहास, धम्म और जनचेतना एक साथ चलते हैं, तो खोई हुई विरासत पुनः जीवित हो उठती है।
आज आवश्यकता है कि गोविषाण को—
जीवंत शोध केंद्र
अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन स्थल
और बौद्ध दर्शन के वैश्विक संदेश केंद्र
के रूप में विकसित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों पर गर्व कर सकें।
भवतु सब्ब मंगलं।

