मूकनायक /राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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“निंदक नियरे राखिये, ऑंगन कुटी छवाय।” कबीर दास जी का यह दोहा आलोचना के महत्व को बताता है, लेकिन आज की आलोचना सुधार के लिए नहीं, बल्कि नीचा दिखाने के उद्देश्य से की जाती है। असल में इंसान का स्वभाव ही ऐसा है कि जब भी कुछ गलत होता है, तो सबसे पहले वह अपने बचाव के लिए कोई कारण या बहाना ढूंढता है और दूसरों को दोष देना उस बचाव का सबसे आसान तरीका बन जाता है। इससे ना तो आत्मग्लानि होती है, ना ही अपनी कमियों का सामना करना पड़ता है।
इसीलिए बहुत से लोग अपनी गलती मानने से बचते हैं और उंगली किसी और की तरफ उठा देते हैं , लेकिन सच्चाई यह है कि जब हम ऐसा करते हैं, तो हम अपने विकास का रास्ता खुद ही रोक देते हैं। अपनी गलतियों को स्वीकार करना भले ही मुश्किल लगता हो, मगर यही आत्म-सुधार का पहला कदम है। हर गलती हमें कुछ सिखाने आती है, अगर हम सीखने को तैयार हों। जो व्यक्ति ना केवल अपनी गलतियों से बल्कि दूसरों की गलतियों से भी सीखने की क्षमता रखता है, वह जीवन में बहुत आगे बढ़ जाता है क्योंकि वह हर अनुभव को एक सीख के रूप में देखता है, दोष के रूप में नहीं। आखिरकार, दूसरों को दोष देना आसान है, लेकिन खुद को बेहतर बनाना ही असली समझदारी है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

