
मूकनायक समाचार, बालाघाट
सत्यशील गोंडाने की कलम से

इतिहास अक्सर मंचों पर गूंजने वाली आवाज़ों को सहेज लेता है, लेकिन उन मौन स्तंभों को भुला देता है, जिनके सहारे परिवर्तन की इमारत खड़ी होती है। माता रमाबाई अंबेडकर ऐसा ही एक नाम हैं—त्याग, संघर्ष और मौन साधना की प्रतीक, जिनके बिना डॉ. भीमराव अंबेडकर का संघर्षपूर्ण जीवन अधूरा माना जाना चाहिए।
07 फरवरी 1898 को जन्मी माता रमाबाई अंबेडकर ने सामाजिक भेदभाव, जातिगत घृणा और घोर आर्थिक अभाव के दौर में भी अदम्य साहस का परिचय दिया। जब-जब डॉ. अंबेडकर के जीवन पथ पर चुनौतियाँ बढ़ीं, तब घर की चारदीवारी के भीतर रहकर माता रमाबाई ने उन संघर्षों की सबसे कठिन जिम्मेदारियाँ अपने कंधों पर उठाईं। उनका योगदान भाषणों में नहीं, बल्कि सहनशीलता, आत्मबल और निरंतर त्याग में अभिव्यक्त हुआ।
यह सामाजिक विडंबना है कि सामाजिक न्याय के विमर्श में डॉ. अंबेडकर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता रहा, लेकिन उनकी जीवनसंगिनी के योगदान पर समाज लंबे समय तक मौन रहा। माता रमाबाई का जीवन यह सिखाता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल नारों और आंदोलनों से नहीं, बल्कि निःस्वार्थ, सेवा, धैर्य और मौन तपस्या से भी संभव होता है।
माता रमाबाई अंबेडकर जयंती के अवसर पर आवश्यक है कि समाज श्रद्धांजलि तक सीमित न रहे, बल्कि उस स्त्री संघर्ष को समझे, जिसने बिना किसी पहचान की अपेक्षा किए सामाजिक क्रांति की नींव को सुदृढ़ किया। उनका जीवन नारी शक्ति, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय की स्थायी प्रेरणा है।
आज भी उनका मौन हमसे प्रश्न करता है—क्या हमने इतिहास के उन अदृश्य स्तंभों को पहचानना सीख लिया है, जो दिखाई नहीं देते, पर पूरी इमारत को संभाले रखते हैं?

