मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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ईर्ष्या एक ऐसा मानवीय भाव है, जो दीमक की तरह व्यक्ति के आत्म-सम्मान, मानसिक शांति और रिश्तों को भीतर से खोखला कर देता है। यह तब उत्पन्न होती है, जब हम अपनी तुलना दूसरों से करते हैं और उनकी सफलताओं या सुखों को अपनी कमी मान लेते हैं। विद्वानों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मानसिक अनुशासन ही वह एकमात्र और सबसे प्रभावी उपाय है, जिससे ईर्ष्या के विषैले प्रभाव से बचा जा सकता है।
ईर्ष्या एक ऐसी अग्नि है, जो अंततः जलाने वाले को ही भस्म कर देती है। इससे बचने के लिए बाहरी उपदेश नहीं, बल्कि आंतरिक नियंत्रण की आवश्यकता है। मानसिक अनुशासन वह ढ़ाल है, जो व्यक्ति को हीन भावना से बचाती है और उसे संतोष व आनंद के मार्ग पर ले जाती है। जिस व्यक्ति ने अपने मन को अनुशासित कर लिया, उसने संसार की सबसे बड़ी जीत हासिल कर ली।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

