माता रमाई अंबेडकर के त्याग, संघर्ष और बलिदान की ऐतिहासिक गाथा को पहली बार बड़े पर्दे पर मिली सशक्त अभिव्यक्ति
मूकनायक
कमलेश लवहात्रै छत्तीसगढ़ प्रभारी
बिलासपुर छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की धरती से निकली हिंदी फिल्म “रमाई” केवल एक सिनेमाई प्रस्तुति नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष और सामाजिक चेतना का जीवंत दस्तावेज़ बनकर उभरी है। यह पहली बार है जब हिंदी सिनेमा में माता रमाई अंबेडकर के त्याग, साहस और बलिदान को इतने सम्मान, संवेदनशीलता और प्रभावशाली ढंग से बड़े पर्दे पर प्रस्तुत किया गया है।
यह फिल्म दर्शकों को उस अद्भुत स्त्री के जीवन से रूबरू कराती है, जो डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर जैसे महान विचारक और संविधान निर्माता की प्रेरणास्रोत रहीं। आर्थिक अभाव, सामाजिक भेदभाव और निजी जीवन के गहरे दुखों के बावजूद माता रमाई अंबेडकर ने कभी हार नहीं मानी। चार-चार संतानों के असमय निधन का असहनीय दर्द हो या अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष—हर परिस्थिति में उन्होंने बाबासाहेब का संबल बनकर उनके सपनों को साकार करने में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।
“रमाई” महिला सशक्तिकरण का सशक्त और जीवंत उदाहरण है। यह फिल्म आज की पीढ़ी को यह संदेश देती है कि परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका कितनी निर्णायक और प्रेरणादायी होती है। दमदार अभिनय, सशक्त संवाद और ऐतिहासिक घटनाओं की भावनात्मक प्रस्तुति दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती है।
छत्तीसगढ़ में निर्मित यह फिल्म न केवल प्रदेश के सिनेमा के लिए गर्व का विषय है, बल्कि स्थानीय कलाकारों को राष्ट्रीय मंच देने का एक सराहनीय प्रयास भी है। यही कारण है कि हर वर्ग और हर आयु के दर्शक पूरे परिवार के साथ इस फिल्म को देखने सिनेमाघरों का रुख कर रहे हैं और भावुक होकर दूसरों से भी इसे देखने का आह्वान कर रहे हैं।
आमजन से विनम्र निवेदन है कि वे अपने परिवार, मित्रों और समाज के साथ सिनेमाघरों में जाकर फिल्म “रमाई” अवश्य देखें। माता रमाई अंबेडकर के त्याग, संघर्ष और बलिदान की इस प्रेरणादायी गाथा को बड़े पर्दे पर अनुभव करें और इस ऐतिहासिक प्रयास को अपना समर्थन दें।
यह फिल्म केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास को समझने, महसूस करने और सम्मान देने का एक सशक्त माध्यम है।


