प्रदेश के विश्वविद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार, विसंगतियां और गिरती साख
मूकनायक
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
///शिक्षा के मंदिर या राजनीति के अखाड़े?//
छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों में वर्तमान समय में व्याप्त प्रशासनिक विसंगतियां, राजनीतिक हस्तक्षेप और शैक्षणिक गिरावट गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। विश्वविद्यालय, जो कभी ज्ञान और शोध के केंद्र माने जाते थे, आज कई मामलों में ‘राजनीति के अखाड़े’ बनते दिखाई दे रहे हैं।
हालिया वर्षों में राज्य के प्रमुख विश्वविद्यालय—जैसे पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय तथा गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय—में सामने आए विवादों ने इनकी साख पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
///अवैध नियुक्तियाँ और प्रशासनिक अनियमितताएँ///
हाल ही में उच्च न्यायालय द्वारा कई प्रभारी नियुक्तियों को अवैध ठहराया गया। योग्य शिक्षाविदों के स्थान पर राजनीतिक पहुँच रखने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति ने संस्थानों की गुणवत्ता और रैंकिंग को प्रभावित किया है।
जनवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, कुछ विश्वविद्यालयों में करोड़ों रुपये की खरीदारी बिना टेंडर प्रक्रिया के किए जाने के आरोप सामने आए। शासन ने इस पर कार्रवाई करते हुए कुछ अधिकारियों को निलंबित भी किया।
लंबे समय से स्थायी पदों पर नियमित नियुक्तियों के बजाय ‘प्रभारी व्यवस्था’ के भरोसे काम चलाया जा रहा है, जिससे जवाबदेही और निर्णय क्षमता दोनों प्रभावित हो रही हैं।
छात्र राजनीति और बाहरी हस्तक्षेप
कैंपस में छात्र राजनीति वैचारिक विमर्श से हटकर बाहरी हस्तक्षेप का माध्यम बनती जा रही है। कई विश्वविद्यालयों ने बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर रोक लगाने के आदेश जारी किए हैं ताकि प्रशासनिक कार्य बाधित न हों।
विशेष रूप से बिलासपुर स्थित विश्वविद्यालयों में छात्र संगठनों द्वारा वित्तीय अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
केंद्रीय बनाम राज्य विश्वविद्यालय : दोहरी चुनौती
- अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय, बिलासपुर
राज्य सरकार के अधीन यह विश्वविद्यालय प्रशासनिक शिथिलता और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा है। छात्र संगठनों, विशेषकर NSUI, ने बिना टेंडर करोड़ों की खरीदारी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं।
स्थायी नियुक्तियों के अभाव और राजनीतिक हस्तक्षेप ने इसकी अकादमिक गरिमा को प्रभावित किया है। - गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर
छत्तीसगढ़ का एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के बावजूद हालिया विवादों ने इसकी छवि धूमिल की है। अगस्त 2025 में कुलपति के विरुद्ध सीड मनी वितरण में पक्षपात के आरोप लगे।
अप्रैल 2025 में एनएसएस शिविर के दौरान धार्मिक गतिविधियों को लेकर विवाद और एफआईआर दर्ज होने से कैंपस का वातावरण प्रभावित हुआ।
जनवरी 2026 में हॉस्टल भोजन की गुणवत्ता को लेकर छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया और कुलपति निवास का घेराव किया। करोड़ों के बजट के बावजूद मूलभूत सुविधाओं की कमी ने प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े किए।
///नियामक संस्थाओं की सीमाएँ///
अक्सर यह प्रश्न उठता है कि यूजीसी और केंद्र सरकार हस्तक्षेप क्यों नहीं करती। इसका उत्तर संवैधानिक ढांचे में निहित है:
शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, परंतु राज्य विश्वविद्यालयों का प्रशासनिक नियंत्रण राज्य सरकार के पास होता है।
यूजीसी केवल मानक और फंडिंग तय कर सकता है; प्रत्यक्ष प्रशासनिक हस्तक्षेप उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
केंद्रीय विश्वविद्यालय स्वायत्त संस्थान माने जाते हैं, जहाँ शिक्षा मंत्रालय सीधे हस्तक्षेप सीमित परिस्थितियों में ही करता है।
कुलाधिपति (राज्यपाल) और राज्य सरकार के बीच समन्वय की कमी भी कई बार विवादों को जन्म देती है।
हाल ही में राज्य में नियम बदला गया कि किसी कर्मचारी के विरुद्ध जांच के लिए राज्यपाल की अनुमति अनिवार्य होगी—इसे कई लोग संवैधानिक टकराव के रूप में देख रहे हैं।
///गिरती रैंकिंग और प्रतिभा पलायन///
एनआईआरएफ तथा अन्य वैश्विक रैंकिंग में राज्य के विश्वविद्यालयों की स्थिति कमजोर हुई है। इसके परिणामस्वरूप:
मेधावी छात्र बाहरी राज्यों या निजी विश्वविद्यालयों की ओर रुख कर रहे हैं।
शोध और नवाचार की गति धीमी पड़ रही है।
प्रशासनिक देरी और परीक्षा संबंधी विसंगतियों से डिग्रियों की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है।
शिकायतें उच्च स्तर तक
मामला इतना गंभीर हो गया कि छात्रों ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं बिल्हा विधायक धर्मलाल कौशिक से शिकायत की तथा आयुक्त उच्च शिक्षा और राज्यपाल कार्यालय तक अपनी बात पहुँचाई।
छात्र संगठनों का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन पारदर्शिता के मूल सिद्धांतों का पालन नहीं कर रहा और कुलसचिव सहित प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है।
///समाधान की दिशा : स्वायत्तता और जवाबदेही का संतुलन///
छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों को इस दलदल से बाहर निकालने के लिए केवल सरकारी जांच पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि—
नियुक्तियों में पूर्ण पारदर्शिता हो।
राजनीतिक हस्तक्षेप सीमित किया जाए।
वित्तीय लेन-देन में ई-टेंडर और सार्वजनिक ऑडिट अनिवार्य किए जाएँ।
छात्र, शिक्षक और प्रशासन के बीच संवाद तंत्र मजबूत हो।
जब तक स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित नहीं होगा, तब तक ये संस्थान अपनी खोई हुई गरिमा पुनः प्राप्त नहीं कर पाएँगे।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
बिलासपुर, छत्तीसगढ़


