अन्धभूतो अयं लोको, तनु केत्थ विपस्सति।
सकुणो जालमुत्तोव, अप्पो सग्गाय गच्छति।।
अर्थ:- यह लोक (प्रज्ञा चक्षु के अभाव में) अंधे जैसा है, यहां विपश्यना करने वाले थोडे ही हैं।जाल से मुक्त हुए पक्षी की भांति विरले ही सुगति अथवा निर्वाण को जाते हैं। (बाकी तो जाल में ही फंसे हुए रहते हैं।)
साधु , साधु, साधु
भवतु सब्बं मगलं
✍️🙏बौद्धाचार्य पूरणमल बौद्ध प्रदेश अध्यक्ष दि बुद्धिष्ट सोसायटी आफ़ इंडिया (भारतीय बौद्ध महासभा) राजस्थान (दक्षिण)

