Thursday, February 26, 2026
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जल-जंगल-जमीन की लड़ाई: बक्साइट खनन के विरोध में आदिवासियों का उकवा में चक्काजाम

मूकनायक/आकाश घरडें (बालाघाट)

ग्रामसभा की अनुमति बिना खनन प्रक्रिया आगे बढ़ाने का आरोप, पेसा और वनाधिकार कानून के उल्लंघन पर आंदोलन तेज

बालाघाट।
दक्षिण बैहर क्षेत्र के पचामा दादर सहित आसपास के विभिन्न आदिवासी ग्रामों में प्रस्तावित बक्साइट खनन के विरोध में गुरुवार को आदिवासी समाज ने उकवा में धरना-प्रदर्शन करते हुए चक्काजाम किया। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जिले में बक्साइट खनन की अनुमति देते समय वैधानिक प्रावधानों और संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। आंदोलन में स्थानीय विधायक संजय उईके भी शामिल हुए और ग्रामीणों की मांगों का समर्थन किया।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगल क्षेत्रों में खनिज दोहन के लिए सरकार द्वारा तय प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जा रहा है। बिना विधिवत प्रक्रिया पूरी किए पीएल (प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस) से माइनिंग लीज स्वीकृत करने की कोशिश की जा रही है, जो ग्रामसभा के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

आंदोलन जारी रखने की चेतावनी

आदिवासी समाज ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता, आंदोलन जारी रहेगा। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपने जल-जंगल-जमीन और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट हैं तथा पर्यावरण से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं करेंगे। उनका आरोप है कि ग्रामसभाओं की सहमति लिए बिना दादर बॉक्साइट ब्लॉक की स्वीकृति प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है, जो पेसा एक्ट 1996 और वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधानों के विपरीत है।
वनाधिकार कानून का हवाला
प्रस्तावित खनन क्षेत्र के अंतर्गत लूद, हिरी, कोंगेवानी, बम्हनी, हर्शनाला, घोंदी, लौगुर, पोला, कंदई सहित 77 ग्रामों को संभावित प्रभावित ग्राम बताया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वनाधिकार मान्यता कानून 2006 की धारा 4(5) के तहत अधिकार सुनिश्चित किए बिना खनन स्वीकृति और जनसुनवाई की तिथि तय करना विधिसंगत नहीं है।

18 फरवरी को प्रस्तावित जनसुनवाई

मेसर्स कटनी मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड को कोटपहर बॉक्साइट ब्लॉक (ग्राम पचामा, तहसील बैहर, जिला बालाघाट) में खनन हेतु पर्यावरण स्वीकृति प्रक्रिया के अंतर्गत दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं। प्रस्तावित लीज क्षेत्र 35.90 हेक्टेयर है और वार्षिक खनन क्षमता 30,139.20 मीट्रिक टन निर्धारित की गई है। वहीं लौंगुर-पचामा दादर के बीच स्थित 60 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 18 फरवरी को जनसुनवाई प्रस्तावित है।

ग्रामीणों की मांग है कि जनसुनवाई से पूर्व सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित किया जाए।

पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में अनिवार्य है ग्रामसभा की अनुमति

विधायक संजय उईके ने कहा कि यह पूरा क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां पेसा एक्ट लागू है। ऐसे में किसी भी वनभूमि के उपयोग से पहले ग्रामसभा की अनुमति अनिवार्य है। उन्होंने आरोप लगाया कि 117, 35, 60 और 156 हेक्टेयर के विभिन्न ब्लॉकों को स्वीकृति देने की प्रक्रिया में ग्रामसभा और वनाधिकार कानून की अनदेखी की जा रही है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नियमों का पालन नहीं किया गया तो यह लड़ाई सड़क से लेकर सदन और न्यायालय तक लड़ी जाएगी।
पर्यावरण और वन्यजीवों पर भी चिंता
आंदोलनकारियों ने बताया कि यह क्षेत्र कान्हा-पेंच कॉरिडोर का हिस्सा है, जहां वन्यजीवों का आवागमन होता है। साथ ही, यह क्षेत्र आदिवासी समुदाय की आस्था से जुड़ा है। उनका कहना है कि उच्च घनत्व वाले इस वन क्षेत्र में सामूहिक वन संसाधन अधिकार अब तक प्रदान नहीं किए गए हैं, जबकि वनाधिकार कानून के तहत इसका प्रावधान है।
उकवा क्षेत्र में बक्साइट खनन को लेकर बढ़ते विरोध ने प्रशासन और सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब सभी की नजर 18 फरवरी की जनसुनवाई और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी है।

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