मूकनायक/ दुर्गेंद्र सम्राट ब्यूरो प्रभारी बस्ती/उत्तर प्रदेश
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 3 फरवरी 2026 को दिशा छात्रा संगठन की ओर से यूजीसी अधिनियम 2026 पर आयोजित परिचर्चा के दौरान हिंसा और अराजकता की गंभीर घटना सामने आई है। आरोप है कि शांतिपूर्ण ढंग से चल रही इस परिचर्चा को बाधित करने के उद्देश्य से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता वहां पहुंचे और देखते ही देखते हंगामा शुरू कर दिया। कुछ ही समय में स्थिति इतनी बिगड़ गई कि परिचर्चा स्थल मारपीट और गाली-गलौच का केंद्र बन गया।
प्रत्यक्षदर्शियों और दिशा संगठन के सदस्यों के अनुसार, परिचर्चा पूरी तरह शांतिपूर्ण माहौल में चल रही थी और छात्र-छात्राएं यूजीसी अधिनियम 2026 जैसे महत्वपूर्ण विषय पर अपने विचार रख रहे थे। इसी दौरान एबीवीपी के कार्यकर्ता नारेबाजी करते हुए कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे और जानबूझकर व्यवधान उत्पन्न करने लगे। जब दिशा के सदस्यों ने शांति बनाए रखने और परिचर्चा जारी रखने की अपील की, तो आरोप है कि एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने मारपीट शुरू कर दी।
दिशा संगठन का आरोप है कि इस दौरान एक वाहन में भरकर बजरंग दल के कार्यकर्ता भी विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश कर गए। दोनों संगठनों के कार्यकर्ताओं ने मिलकर दिशा के महिला और पुरुष सदस्यों के साथ न सिर्फ गाली-गलौच की, बल्कि शारीरिक हिंसा भी की। महिला साथियों के साथ अत्यंत अभद्र व्यवहार किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। बताया गया है कि कुछ छात्राओं के बाल खींचे गए और उन्हें पीटा गया। वहीं कई पुरुष छात्र गंभीर रूप से घायल हुए किसी के सिर में चोट आई तो किसी की नाक से खून बहने लगा।
घटना के दौरान प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। दिशा संगठन का कहना है कि पूरी घटना के समय विश्वविद्यालय प्रशासन और सुरक्षाकर्मी मूकदर्शक बने रहे। आरोप है कि न तो समय पर हस्तक्षेप किया गया और न ही हिंसा रोकने का कोई प्रभावी प्रयास हुआ। विश्वविद्यालय परिसर में आम तौर पर छात्रों को अपने वाहन लाने की अनुमति नहीं होती, लेकिन इसके बावजूद बजरंग दल के कार्यकर्ताओं की भारी गाड़ी बिना किसी रोक-टोक के सीधे परिसर के भीतर पहुंच गई। यह तथ्य प्रशासन की कथित पक्षपातपूर्ण भूमिका की ओर इशारा करता है।
घटना के बाद घायल दिशा सदस्यों को कथित तौर पर जबरन प्रॉक्टर कार्यालय में बैठा दिया गया। संगठन का आरोप है कि एक छात्रा निधि के साथ मारपीट करने वालों में महावेश दूबे भी शामिल था, जिससे वह घायल हुई। दिशा के सदस्यों का कहना है कि इस दौरान न तो किसी गार्ड ने उनकी सुध ली और न ही प्रशासन का कोई जिम्मेदार अधिकारी उनकी मदद के लिए आगे आया। उलटे, हिंसा करने वाले लोग प्रशासन और सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में वहां से चले गए, जबकि पीड़ित छात्रों को ही प्रॉक्टर कार्यालय में रोके रखा गया।
इस घटना ने विश्वविद्यालय परिसरों में लगातार सिकुड़ते जनवादी स्पेस को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। छात्रों के भविष्य से सीधे जुड़े मुद्दों पर खुली चर्चा लोकतांत्रिक माहौल की बुनियाद होती है, लेकिन ऐसे आयोजनों को हिंसा के जरिए दबाने की कोशिशें सवाल खड़े करती हैं।
दिशा संगठन का कहना है कि प्रशासन और कथित फासीवादी संगठनों की सांठ-गांठ के चलते छात्रों की आवाज को कुचला जा रहा है। इसके बावजूद छात्र संगठनों का मानना है कि परिसरों में जनवादी स्पेस की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखना जरूरी है और ऐसी परिचर्चाओं को और व्यापक स्तर पर आयोजित किया जाना चाहिए।
घटना ने विश्वविद्यालय में लागू नियम-कानूनों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं। आम छात्रों के लिए सख्त नियम बनाए जाते हैं, लेकिन जब बात एबीवीपी और बजरंग दल जैसे संगठनों की आती है तो इन्हीं नियमों को दरकिनार कर दिया जाता है। आरोप है कि यह सब छात्रों में डर और भय का माहौल बनाने के लिए किया जाता है, ताकि वे अपने अधिकारों के लिए संगठित न हो सकें। छात्र संगठनों ने ऐसे नियमों को बदलने की मांग उठाई है जो छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करते हैं।
यूजीसी अधिनियम 2026 को लेकर चल रही बहस भी इस घटना के केंद्र में है। दिशा संगठन का कहना है कि यह अधिनियम सरकार की कृपा नहीं, बल्कि वर्षों से जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ चले छात्र आंदोलनों का परिणाम था, भले ही यह अभी अधूरा ही क्यों न रहा हो। अधिनियम के लागू होने के बाद विभिन्न फासीवादी संगठनों ने इसके विरोध में प्रदर्शन किए, जबकि कुछ ही समय में सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। संगठन का आरोप है कि जहां हेट स्पीच और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर दाखिल याचिकाओं पर अदालत की चुप्पी सवाल खड़े करती है, वहीं इस अधिनियम पर तुरंत रोक लगना संस्थानों में फासीवादी प्रभाव के बढ़ने की ओर इशारा करता है।
कुल मिलाकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय की यह घटना न केवल छात्र राजनीति में बढ़ती हिंसा को उजागर करती है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की स्थिति पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।

