रमाबाई भीमराव आंबेडकर ( 07 फ़रवरी 1898 – 27 मई 1935) भीमराव आम्बेडकर की पत्नी थीं।[1]
रमाबाई अम्बेडकर का जन्म
07 फ़रवरी 1898 वणंदगाव,रत्नागिरी
परिनिरवाण मई 27, 1935 (उम्र 37 वर्ष)
जाति महार की थी उनका विवाह डॉ भीमराव अम्बेडकर के साथ हुआ था। इनके 14 बच्चों में एक बेटा जीवित बचा।
जीवित बच्चा यशवंतरावआम्बेडकर बचा था
रमाबाई का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। वो अपने पिता भिकु धुत्रे (ब्राह्मण) व माता रुक्मिणी के साथ पास के वंणद गांव में नदी किनारे महारपुरा बस्ती में रहती थी। उन्हें ३ बहनें व एक भाई – शंकर था। रमाबाई की बड़ी बहन दापोली में रहती थी। भिकु दाभोल बंदरगाह में मछलिओं से भरी हुई टोपलिया बाजार में पहुंचाते थे। रमा के बचपन में ही उनकी माता का बिमारी से निधन हुआ था। माता के जाने से बच्ची रमा के मन पर आघात हुआ। छोटी बहन गौरा और भाई शंकर तब छोटे थे। कुछ दिन बाद उनके पिता भिकु का भी निधन हो गया। आगे वलंगकर चाचा और गोविंदपुरकर मामा इन सब बच्चों को लेकर मुंबई में चले गये और वहां भायखला चाळ में रहने लगे।
सुभेदार रामजी आंबेडकर यह अपने पुत्र भीमराव आंबेडकर के लिए वधू की तलाश कर रहे थे। वहां उन्हे रमाबाई का पता चला, वे रमा को देखने गये। रमा उन्हें पसंद आई और उन्होंने रमा के साथ अपने पुत्र भीमराव की शादी कराने का फैसला कर लिखा। विवाह के लिए तारिख सुनिश्चित कि गई और अप्रैल 1906 में रमाबाई का विवाह भीमराव आंबेडकर से सपन्न हुआ। विवाह के समय रमा की आयु महज 9 वर्ष एवं भीमराव की आयु 14 वर्ष थी और वे 5 वीं में अंग्रेजी कक्षा पढ रहे थे।तब से त्याग मूर्ति माता रमाबाई का संघर्ष शुरू होता है।जो समाज के लिए समर्पित रहा है।
केवल त्याग की प्रतिमा नहीं थीं वे कर्म, चेतना और संघर्ष की साझीदार थीं।
हमें बार-बार यही बताया गया कि रमाबाई आंबेडकर एक सहनशील, मौन और आज्ञाकारी पत्नी थीं
जो घर संभालती रहीं, दुख झेलती रहीं और इतिहास के हाशिये पर चुपचाप खड़ी रहीं।
लेकिन यह पूरा सच नहीं है।
बल्कि सच यह है कि यह सच जानबूझकर छोटा किया गया।
माता रमाबाई केवल बाबासाहेब की पत्नी नहीं थीं।वे उनके मुक्ति-संघर्ष की बराबर की साथी थीं। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने ने अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण कृति (पुस्तक)
‘Thoughts on Pakistan’ (1941)
माता रमाबाई को समर्पित की थी।
उनके हृदय की सुंदरता, बुद्धि की श्रेष्ठता और चरित्र की दृढ़ता के सम्मान में।
यह कोई औपचारिक समर्पण नहीं था, बल्कि एक वैचारिक साझेदारी की स्वीकृति थी।
माता रमाबाई सिर्फ़ “घर संभालने वाली” स्त्री नहीं थीं
उन्होंने दलित समाज के लिए अपनी शैक्षणिक संस्थाओं की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। वे पिछड़े वर्ग, अछूत वर्ग महिला सशक्तिकरण की सक्रिय भूमिका में थीं। 1930 के दशक में, जब दलित महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति असाधारण थी।तब वे सैकड़ों महिलाओं की राजनीतिक बैठकों का हिस्सा थीं। मंदिर सत्याग्रह, राजनीतिक अधिकार और महिला प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर
वे खुलकर आंदोलन के साथ खड़ी थीं।
धारवाड़ : जहां त्याग नहीं, कर्म दिखाई देता है।
धारवाड़ में दलित छात्रों का हॉस्टल बदहाली की हालत में था।
माता रमाबाई ने यह देखा—और चुप नहीं रहीं।
उन्होंने अपने सोने के गहने बेच दिए, ताकि हॉस्टल की ज़रूरतें पूरी हो सकें । वे खुद छात्रों के लिए भोजन पकाती थीं बीमार शरीर के बावजूद वर्षों तक हॉस्टल की देखभाल करती रहीं यह कोई भावुक बलिदान नहीं था।
यह ज़मीन पर उतरकर किया गया समाज-सुधार था।
निजी दुख, लेकिन सामूहिक चेतना।
चार संतानों की असमय मृत्यु।
लगातार बीमारी।
आर्थिक तंगी और सामाजिक अपमान।
इसके बावजूद रमाबाई टूटी नहीं गईं।
जब बाबासाहेब अपने पुत्र राजरतन की मृत्यु से बिखर गए थे,तो माता रमाबाई ने उन्हें संबल देते हुए कहा था—> “अगर आप अपने दुख पर जीत हासिल करेंगे,
तो इससे समाज का भला होगा।”
यह किसी “कमज़ोर” स्त्री की भाषा नहीं है।
यह राजनीतिक चेतना से लैस साथी की आवाज़ है।
फिर इतिहास ने क्या किया?
इतिहास ने उन्हें “कर्तव्यनिष्ठ गृहिणी” बना दिया।
कुछ तथाकथित नारीवादियों ने भी उन्हें घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया।
कुछ लेखकों ने संदिग्ध और झूठे स्रोतों के सहारे
माता रमाबाई को कमजोर साबित करने की कोशिश की।
यह उपेक्षा नहीं थी।यह वैचारिक अन्याय था। सच यह है —
माता रमाबाई अम्बेडकर
✔️ साथी थीं
✔️ शक्ति थीं
✔️ कामरेड थीं
✔️ समाज-सुधारक थीं
माता रमाबाई केवल त्याग की मूर्ति नहीं थीं—
वे उस संघर्ष की रीढ़ थीं
जिसने भारत को संविधान तक पहुँचाया।
अब समय है इतिहास को ठीक करने का। माता रमाबाई को
हाशिये से निकालकर केंद्र (दिमाग)में रखने का। समाज में महिलाओं को बताने का।
रमाबाई आंबेडकर को याद करें।
✍️ बौद्धाचार्य पूरणमल बौद्ध प्रदेश अध्यक्ष दि बुद्धिष्ट सोसायटी आफ़ इंडिया (भारतीय बौद्ध महासभा) राजस्थान (दक्षिण)
7240790414

