

बिलासपुर। भारत में 26 जनवरी का दिन केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय के संकल्प का प्रतीक है। इसी दिन वर्ष 1950 में भारत का संविधान लागू हुआ और देश एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बना। यह दिन भारतीय नागरिकों को उनके अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की भी याद दिलाता है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के केंद्र में रहे संविधान के प्रमुख शिल्पकार डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिनकी दूरदर्शिता और संघर्षशील सोच ने भारत की आत्मा को शब्दों में ढाल दिया।
संविधान निर्माण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका
डॉ. अंबेडकर संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में तैयार किया गया संविधान केवल कानूनों का दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का घोषणापत्र है। उन्होंने ऐसे भारत की कल्पना की, जहां जन्म नहीं बल्कि योग्यता व्यक्ति का भविष्य तय करे।
डॉ. अंबेडकर का स्पष्ट मत था— “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित न हो।” इसी विचार को उन्होंने संविधान की आत्मा बनाया।
अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के उत्थान के लिए प्रावधान
डॉ. अंबेडकर स्वयं सामाजिक भेदभाव के शिकार रहे, इसलिए उन्होंने संविधान में वंचित वर्गों के अधिकारों को विशेष संरक्षण दिया—
- अनुच्छेद 15 और 17 के माध्यम से जातिगत भेदभाव और छुआछूत का पूर्ण उन्मूलन
- अनुच्छेद 46 के तहत अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों के शैक्षणिक व आर्थिक हितों की सुरक्षा
- आरक्षण व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता, ताकि सदियों से वंचित वर्ग मुख्यधारा में आ सकें
- सरकारी नौकरियों, शिक्षा और प्रतिनिधित्व में समान अवसर सुनिश्चित किए गए
ये प्रावधान केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की ठोस व्यवस्था थे।
महिलाओं के अधिकारों के प्रबल पक्षधर
डॉ. अंबेडकर महिलाओं की समानता के सबसे मजबूत संवैधानिक पक्षधर थे। उन्होंने कहा था— “मैं किसी समाज की प्रगति का आकलन उस समाज में महिलाओं की स्थिति से करता हूं।”
महिलाओं के लिए उनके प्रमुख योगदान—
- संविधान में समानता का अधिकार
- संपत्ति में अधिकार की अवधारणा
- श्रम कानूनों में महिलाओं के हितों की रक्षा
- हिंदू कोड बिल के माध्यम से विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में सुधार का प्रयास
आज भारतीय महिला सशक्तिकरण की जो आधारशिला दिखाई देती है, वह इन्हीं विचारों पर टिकी है।
असाधारण योग्यता और अद्वितीय व्यक्तित्व-
डॉ. अंबेडकर केवल संविधान निर्माता नहीं, बल्कि एक महान अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता, समाज सुधारक और शिक्षाविद थे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनकी विद्वत्ता और दृष्टि आज भी विश्वभर में सम्मानित है।
गणतंत्र दिवस का महत्व-
गणतंत्र दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि भारत में सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता है। यह दिन संविधान की सर्वोच्चता, कानून के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुष्टि करता है। गणतंत्र का अर्थ केवल सरकार का गठन नहीं, बल्कि ऐसा शासन तंत्र है जिसमें प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार, अवसर और सम्मान प्राप्त हो।
नागरिकों के कर्तव्य और संवैधानिक जिम्मेदारी
संविधान नागरिकों को अधिकार देने के साथ-साथ कर्तव्यों का भी बोध कराता है। गणतंत्र दिवस हमें यह संकल्प दिलाता है कि—
- संविधान और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें
- सामाजिक समरसता और भाईचारे को बनाए रखें
- जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव का विरोध करें
- लोकतांत्रिक संस्थाओं और कानून का सम्मान करें
- देश की एकता, अखंडता और गरिमा की रक्षा करें
- सशक्त लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं, बल्कि जागरूक और जिम्मेदार नागरिकों से बनता है।
राष्ट्र के लिए समर्पित जीवन-
डॉ. अंबेडकर का पूरा जीवन शोषित, वंचित और उपेक्षित वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता। उन्होंने सत्ता को नहीं, सिद्धांतों को चुना। संविधान के माध्यम से उन्होंने करोड़ों भारतीयों को न केवल अधिकार दिए, बल्कि आत्मसम्मान भी दिया।
26 जनवरी का संदेश-
गणतंत्र दिवस हमें यह संदेश देता है कि संविधान केवल किताबों में सीमित न रहे, बल्कि हमारे आचरण, सोच और सामाजिक व्यवहार में दिखाई दे। 26 जनवरी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि डॉ. अंबेडकर के सपनों—न्याय, समानता और मानव गरिमा—को जीवित रखने का दिन है।

