Thursday, February 26, 2026
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हिमाचल के सेब बागानों में टहनियां जलाने पर रोक: सरकार ने पंचायत स्तरीय निगरानी समितियां गठित, कुमारसैन में सख्त कार्रवाई शुरू*

 धर्मपाल, शिवान, हि0प्र0 | हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक क्षेत्रों में सर्दियों की छंटाई के बाद बागों में टहनियां, पत्तियां और झाड़ियां जलाने की पुरानी प्रथा अब एक बड़ी पर्यावरणीय समस्या बन चुकी है। यह प्रथा न केवल हवा को प्रदूषित कर रही है बल्कि स्थानीय निवासियों की सेहत पर भी बुरा असर डाल रही है। राज्य सरकार ने इस समस्या पर काबू पाने के लिए पंचायत स्तरीय समितियां गठित की हैं, जो बागों की निगरानी करेंगी और उल्लंघन करने वालों पर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करेंगी। विशेष रूप से कुमारसैन क्षेत्र में इस प्रथा को रोकने के लिए स्थानीय प्रशासन ने सख्त कदम उठाए हैं, जहां सेब उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। यह समस्या मुख्य रूप से शिमला जिले के सेब बेल्ट में देखी जा रही है, जिसमें चोपल का मड़ावग, ठियोग, कोटखाई, जुब्बल, रोहड़ू, ननखड़ी, कोटगढ़ और कुमारसैन जैसे इलाके शामिल हैं। हर साल सर्दियों में सेब के पेड़ों की छंटाई के बाद किसान सूखी टहनियां और झाड़ियां जला देते हैं, जिससे घने धुएं के बादल गांवों और घाटियों पर छा जाते हैं। यह धुआं कई दिनों तक टिका रहता है, जो मैदानी इलाकों में पराली जलाने जैसी स्थिति पैदा कर देता है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, यह जलाना महीन कणों (पीएम), कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसों को हवा में छोड़ता है, जो हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाता है। सर्दियों में कम तापमान और हवा की कम गति के कारण धुआं घाटियों में फंस जाता है, जिससे वायु गुणवत्ता सूचकांक खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है। स्थानीय निवासियों की शिकायतें बढ़ने के साथ ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। आंखों में जलन, खांसी, सांस लेने में तकलीफ, सिरदर्द और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां आम हो गई हैं। बच्चे, बुजुर्ग और श्वसन संबंधी रोगों से पीड़ित लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। अध्ययनों से पता चला है कि यह प्रथा अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और लंबे समय तक फेफड़ों की क्षति का खतरा बढ़ाती है। इसके अलावा, मिट्टी की उर्वरता पर भी असर पड़ता है, क्योंकि जैविक पदार्थ जलकर नष्ट हो जाता है, जो मिट्टी की सेहत को बिगाड़ता है। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में यह प्रथा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ावा देती है, जो हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए चिंता का विषय है। इस समस्या के पीछे मुख्य कारण किफायती विकल्पों की कमी है। जलाना सबसे आसान और सस्ता तरीका माना जाता है, लेकिन किसानों के पास श्रेडिंग मशीनें या कंपोस्टिंग सुविधाएं नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि टहनियों को काटकर मल्चिंग (मिट्टी में मिलाना) या जैविक खाद बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है, जो मिट्टी की नमी बनाए रखने और उर्वरता बढ़ाने में मदद करता है। हालांकि, छोटे और सीमांत किसानों के लिए ऐसी मशीनरी महंगी है, और सरकारी सहायता की कमी से यह प्रथा जारी है।राज्य सरकार ने अब इस पर सख्ती बरतनी शुरू कर दी है। थियोग सब-डिवीजन में सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) ने सभी पंचायतों को सख्त आदेश जारी किए हैं कि बागों में किसी भी प्रकार की टहनियां या झाड़ियां जलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पंचायतों को बागों की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है, और उल्लंघन करने वालों पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। कुमारसैन में भी ऐसी समितियां गठित की गई हैं, जहां स्थानीय पंचायत प्रतिनिधि, किसान और प्रशासनिक अधिकारी मिलकर निगरानी करेंगे। यह समितियां नियमित रूप से बागों का दौरा करेंगी और किसानों को जागरूक करेंगी। अगर कोई जलाने की घटना पकड़ी जाती है, तो पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत जुर्माना या अन्य दंड लगाया जाएगा। सरकार से मांग की जा रही है कि श्रेडिंग मशीनों और कंपोस्टिंग उपकरणों पर सब्सिडी दी जाए, ताकि किसान वैकल्पिक तरीकों को अपनाएं। जागरूकता अभियान चलाने की भी जरूरत है, जिसमें स्कूलों, गांवों और किसान संघों को शामिल किया जाए। थियोग का यह मॉडल पूरे राज्य में लागू किया जा सकता है, जिससे सेब उत्पादन की स्थिरता बनी रहे और पर्यावरण संरक्षित हो। यह कदम न केवल वायु प्रदूषण को रोकेगा बल्कि हिमाचल की सेब अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा, जो राज्य की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान देती है। यदि यह प्रथा जारी रही, तो भविष्य में स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट और गहरा सकता है। स्थानीय किसान संगठनों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन वे मांग कर रहे हैं कि वैकल्पिक समाधानों के लिए तत्काल सहायता प्रदान की जाए।

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