मूकनायक न्यूज/दिलीप कुमार/सिरोही/राजस्थान।
सिरोही: जिला मुख्यालय पर15 जनवरी को विभिन्न सामाजिक और बहुजन संगठनों ने संयुक्त रूप से एक बड़े धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया। क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ,राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग मोर्चा, बहुजन क्रांति मोर्चा, भारत मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय परिवर्तन मोर्चा और भारतीय विद्यार्थी मोर्चा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस प्रदर्शन में सैकड़ों कार्यकर्ता और समर्थक शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने ओबीसी समुदाय की जाति-आधारित जनगणना, चुनावों में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर का इस्तेमाल, आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन अधिकारों की रक्षा और हाल ही में रद्द किए गए बामसेफ एवं भारत मुक्ती मोर्चा के राष्ट्रीय अधिवेशन के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। यह प्रदर्शन लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों पर कथित हमले के विरोध में आयोजित किया गया। प्रदर्शन का नेतृत्व बहुजन क्रांति मोर्चा के जिला संयोजक और वरिष्ठ अधिवक्ता सुंदर लाल मोसलपुरिया ने किया। मोसलपुरिया ने प्रदर्शन के दौरान मीडिया से बातचीत में कहा, “यह धरना सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा का आंदोलन है। सरकारें साजिश रचकर हमारे अधिकारों को कुचल रही हैं, लेकिन हम चुप नहीं बैठेंगे। ओबीसी समुदाय की सही गिनती होनी चाहिए और उन्हें उनकी आबादी के अनुपात में हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।” उनके नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए जैसे ‘ओबीसी की गिनती करो, न्याय दो’, ‘ईवीएम हटाओ, लोकतंत्र बचाओ’ और ‘जल-जंगल-जमीन आदिवासियों का अधिकार’। प्रदर्शन स्थल पर बैनर और पोस्टर लगाए गए थे, जिनमें इन मांगों को प्रमुखता से उजागर किया गया था।
प्रदर्शन के मुख्य मुद्दों पर गौर करें तो पहला प्रमुख बिंदु ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की जाति-आधारित जनगणना है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में ओबीसी समुदाय की सही संख्या का आकलन नहीं हो रहा है, जिससे उन्हें शिक्षा, नौकरी और राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा। वे मांग कर रहे हैं कि जनगणना में जाति-आधारित डेटा संकलित किया जाए और ओबीसी को उनकी आबादी के अनुपात में सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व और अवसर प्रदान किए जाएं। एडवोकेट दशरथ सिंह आढ़ा ने बताया, “ओबीसी भारत की बड़ी आबादी है, लेकिन उनकी हिस्सेदारी नगण्य है, यह सामाजिक न्याय की हत्या है। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा है। भारत मुक्ति मोर्चा के जिलाध्यक्ष डॉ आसुराम लूनिया ने ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) पर सवाल उठाते हुए बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की। उनका आरोप है कि ईवीएम में छेड़छाड़ की संभावना रहती है, जो लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। “ईवीएम से चुनाव में धांधली आसान है, जबकि बैलेट पेपर पारदर्शी है। हम चाहते हैं कि चुनाव आयोग इस पर तुरंत विचार करे,” एडवोकेट गोविन्द राणा ने कहा यह मांग हाल के चुनावी विवादों के संदर्भ में और भी प्रासंगिक लग रही है, जहां कई राजनीतिक दलों ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।
राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद के मोहन लाल मीणा ने सरकार पर आरोप लगाया कि आदिवासियों को उनके पारंपरिक जल, जंगल और जमीन से जबरन बेदखल किया जा रहा है। विकास परियोजनाओं के नाम पर वनों की कटाई और भूमि अधिग्रहण को रोकने की मांग की गई। “आदिवासी हमारे देश की मूल निवासी हैं, लेकिन उन्हें उनके ही संसाधनों से वंचित किया जा रहा है। यह अन्याय बंद होना चाहिए। क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव राजेंद्र सिंह परमार ने कहा क्षत्रिय समाज को फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और तथाकथित धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से क्षत्रिय समुदाय की छवि को विकृत करने के खिलाफ भी यह धरना प्रदर्शन है। परमार ने कहा, “यह चरित्र हनन सुनियोजित षड्यंत्र है, जो हमारे इतिहास और संस्कृति को बदनाम कर रहा है। हम मांग करते हैं कि ऐसी सामग्री पर तत्काल रोक लगाई जाए। इस धरना-प्रदर्शन का एक प्रमुख कारण हाल ही में ओडिशा के कटक में प्रस्तावित बामसेफ (बैकवर्ड एंड माइनॉरिटीज कम्युनिटीज एम्प्लॉयी फेडरेशन) और भारत मुक्ति मोर्चा का राष्ट्रीय अधिवेशन का रद्द होना भी है। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि अधिवेशन को अनुमति मिलने के बावजूद आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) की केंद्र व राज्य सरकारों ने साजिश रचकर इसे रद्द करवाया। “यह सीधा जनता के मौलिक अधिकारों पर हमला है। संविधान लागू होने के 76 साल बाद भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सभा करने का अधिकार छीना जा रहा है। यह लोकतंत्र पर प्रहार है और हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे,” सुंदर लाल मोसलपुरिया ने चेतावनी दी कि अगर ऐसी साजिशें जारी रहीं तो पूरे देश में बड़े स्तर पर आंदोलन छेड़ा जाएगा।
कार्यकर्ताओं ने शांतिपूर्वक अपनी मांगें रखीं और धरना समाप्त होने से पहले एक संयुक्त ज्ञापन तैयार कर राष्ट्रपति के नाम जिला कलेक्टर को सौंपा। इसमें सभी मांगों को विस्तार से उल्लेख किया गया है। विभिन्न मोर्चों के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह सिर्फ शुरुआत है और अगर मांगें नहीं मानी गईं तो आगे और बड़े प्रदर्शन किए जाएंगे। यह घटना सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की बहस को फिर से गर्म कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रदर्शन ओबीसी, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के बढ़ती असंतोष को दर्शाते हैं, जो राजनीतिक दलों के लिए एक चेतावनी हो सकती है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।
इस अवसर पर एडवोकेट कुलदीप रावल, एडवोकेट भरत रावल, एडवोकेट प्रवीण छिपा, एडवोकेट प्रदीप कलावत, एडवोकेट रामलाल राणा, एडवोकेट गोविन्द राणा, एडवोकेट अरविंद पाड़िया, एडवोकेट भंवर सिंह देवड़ा, एडवोकेट राजेन्द्र सिंह राव, एडवोकेट आनंद देव सुमन, एडवोकेट मुनव्वर हुसैन, एडवोकेट कौशिक धवल, एडवोकेट प्रकाश धवल, एडवोकेट दीपक बोडाना, एडवोकेट पिंटू सिंह, एडवोकेट ऋत्विक सिंह देवड़ा, एडवोकेट पुष्प राज, भूपेंद्र सिंह, प्रवीण सिंह,बाबूलाल मीणा , दीक्षा बामणिया, फूलाराम जोगसन, फूलाराम डाबी, नेमाराम, मिश्रीमल चौहान, भवानी शंकर गर्ग, डूगाराम पालड़ी आर, मंछाराम , संजीव कुमार ,डॉ सी पी मकवाना सहित सैकड़ों कार्यकर्ता मौजूद रहे।

