मूकनायक /रमेश पोडिया
हरियाणा
सतगुरु रविदास का जन्मोत्सव केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं है। यह अवसर आत्ममंथन का है — यह सोचने का कि जिन कुरीतियों, पाखंडों और सामाजिक भेदभावों के विरुद्ध सतगुरु रविदास ने अपना पूरा जीवन समर्पित किया, क्या आज उन्हीं बुराइयों को हम उनके नाम से वैधता तो नहीं दे रहे हैं। यह प्रश्न असहज अवश्य है, पर आवश्यक है।
सतगुरु रविदास का संघर्ष किसी एक जाति, वर्ग या पंथ के लिए नहीं था। उनका संघर्ष मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए था। उन्होंने अपने समय की उस व्यवस्था को चुनौती दी जिसमें जन्म के आधार पर किसी को ऊँचा और किसी को नीचा ठहराया जाता था। वे न तो किसी धर्म की स्थापना के लिए आए, न किसी नए पंथ के निर्माण के लिए, और न ही किसी संस्था या संगठन के विस्तार के लिए। उनका पूरा जीवन एक विचार था — सत्य, श्रम, समानता और मानव गरिमा का विचार।
वाणी का आशय और आज की गलत व्याख्याएँ
सतगुरु रविदास की वाणी का मूल भाव आत्मपरिवर्तन है, न कि बाहरी आडंबर। जब वे कहते हैं—
“पड़ीऐ गुनीऐ नामु सभु सुनीऐ, अनभउ भाउ न दरसै।”
तो वे यह नहीं नकारते कि पढ़ना-लिखना या ज्ञान अर्जित करना व्यर्थ है। वे यह स्पष्ट करते हैं कि यदि ज्ञान केवल शब्दों तक सीमित है, यदि उससे मन में अनुभव, करुणा और प्रेम उत्पन्न नहीं होता, तो वह ज्ञान आत्मा को रूपांतरित नहीं कर सकता। इसी संदर्भ में वे लोहा और पारस का उदाहरण देते हैं — पारस के स्पर्श के बिना लोहा कभी सोना नहीं बन सकता। अर्थात् सत्संग और सत्य के बिना मनुष्य का रूपांतरण असंभव है।
आगे वे कहते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार — ये पाँच विकार मिलकर मनुष्य को लूट लेते हैं। आज विडंबना यह है कि यही विकार धार्मिक पहचान की आड़ में और अधिक शक्तिशाली हो गए हैं। अहंकार अब व्यक्ति का नहीं, बल्कि जाति, धर्म और पंथ का हो गया है।
“हम बड़ कबि, कुलीन, पंडित” — अहंकार पर सीधा प्रहार
सतगुरु रविदास जी ने उन सभी प्रवृत्तियों पर चोट की जो स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगी रहती हैं। वे कहते हैं कि “मैं बड़ा ज्ञानी हूँ, कुलीन हूँ, पंडित हूँ” — यह सोच कभी समाप्त नहीं होती। यही सोच समाज को बाँटती है और मनुष्य को मनुष्य से अलग करती है।
आज जब हम अपने-अपने पंथ, डेरों और संगठनों को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे हैं, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम उसी मानसिकता को आगे नहीं बढ़ा रहे, जिसे सतगुरु रविदास जी ने नकारा था।
जाति का उल्लेख : आत्मस्वीकृति या सामाजिक चुनौती?
सबसे अधिक विवाद सतगुरु रविदास द्वारा अपनी जाति के उल्लेख को लेकर किया जाता है। “कह रविदास चमार” जैसी पंक्तियों को संदर्भ से काटकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि उन्होंने स्वयं जातिवादी पहचान को स्वीकार किया। जबकि सच्चाई इसके ठीक विपरीत है।
सतगुरु रविदास जाति को महिमामंडित नहीं कर रहे थे, बल्कि समाज को आईना दिखा रहे थे। वे यह कह रहे थे कि जिस जाति को समाज ने हीन समझा, उसी जाति का व्यक्ति यदि सत्य, श्रम और ईश्वर-चेतना से जुड़ जाए, तो वही समाज उसके चरणों में शीश झुकाने को विवश हो जाएगा। उनका संदेश स्पष्ट था — यहाँ कोई जाति ऊँची या नीची नहीं है, ऊँचा या नीचा केवल कर्म होता है।
इसी सामाजिक दृष्टि के साथ सतगुरु रविदास ने यह भी स्पष्ट किया कि वे किस प्रकार का समाज चाहते थे। वे केवल विरोध तक सीमित नहीं रहे, बल्कि एक वैकल्पिक समाज-दर्शन प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने दोहे में साफ कहा —
“ऐसा चाहु राज में, मिले सभी को अन्न।
छोट बड़ों सब सम बसे, रविदास रहे प्रसन्न।”
अर्थात वे ऐसा समाज चाहते थे जहाँ कोई भूखा न रहे, कोई छोटा-बड़ा न हो, कोई नीच या महान न कहलाए। सबको अन्न मिले, सबको सम्मान मिले और सब समानता से रहें। दुर्भाग्य यह है कि न उनके समय के राजा-महाराजा, जिन्हें उनका शिष्य कहा गया, इस विचार को व्यवहार में उतार पाए और न आज हम, जो उनके नाम पर अलग-अलग पंथ और संस्थाएँ खड़ी कर चुके हैं।
सतगुरु रविदास जी ने अपनी सामाजिक कल्पना को “बेगमपुरा” के रूप में व्यक्त किया, जो किसी भौगोलिक स्थान का नाम नहीं, बल्कि एक आदर्श मानवीय समाज की संकल्पना है। वे कहते हैं —
“बेगम पुरा सहर को नाउ ॥
दूखु अंदोडु नही तिहि ठाउ ॥
नां तसवीस खिराजु न मालु ॥
खउफु न खता न तरसु जवालु ॥”
यह वह समाज है जहाँ न दुःख है, न चिंता, न कर, न भय और न ही शोषण। वे आगे कहते हैं —
“अब मोहि खूब वतन गह पाई ॥
ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ॥”
यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि उन्हें ऐसा ही वतन प्रिय है जहाँ सबका कल्याण हो और भाईचारा हो। फिर वे कहते हैं —
“काइमु दाइमु सदा पातिसाही ॥
दोम न सेम एक सो आही ॥”
अर्थात उस समाज में कोई दोयम दर्जे का नागरिक नहीं होगा, सब बराबर होंगे। आगे वे कहते हैं —
“आबादानु सदा मसहूर ॥
ऊहां गनी बसहि मामूर ॥”
यह समाज समृद्ध होगा, जहाँ लोग अभाव और अपमान में नहीं जिएँगे। फिर वे कहते हैं —
“तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै ॥
महरम महल न को अटकावै ॥”
अर्थात स्वतंत्रता होगी, आवागमन पर कोई रोक नहीं होगी, कोई विशेष वर्ग के लिए महल और दूसरों के लिए झोपड़ी नहीं होगी। और अंत में वे कहते हैं —
“कहि रविदास खलास चमारा ॥
जो हम सहरी सु मीतु हमारा ॥”
यहाँ “खलास” का अर्थ है — मुक्त। जाति, भय और हीनता से मुक्त मनुष्य। यही सतगुरु रविदास जी का सपना था।
आज प्रश्न यह है कि क्या हम बेगमपुरा की दिशा में आगे बढ़े हैं, या उससे और दूर चले गए हैं। यदि वास्तव में अलग पहचान बनानी थी, तो वह पहचान शिक्षा, विवेक और आत्मनिर्भरता की होनी चाहिए थी। समाज को स्कूलों, कॉलेजों, तकनीकी संस्थानों, शोध केंद्रों और रोजगार के अवसरों की आवश्यकता थी। पर हमने आसान रास्ता चुना — जाति और धर्म के नाम पर भावनाओं को भड़काने का रास्ता।
भावनाओं के सहारे भीड़ तो जुटाई जा सकती है, पर समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता। बिना विचार के संगठन खोखले होते हैं और समय के साथ अपने ही उद्देश्य से भटक जाते हैं।
पंथों की होड़ और विचारों से विचलन
उत्तर प्रदेश में आदि धर्म, पंजाब में विभिन्न डेरे, और विदेश में घटित घटनाओं के बाद रविदासिया धर्म की स्थापना — ये सभी घटनाएँ अपने-अपने संदर्भ में हुईं, परंतु इनका परिणाम क्या निकला, यह देखना आवश्यक है।
क्या इन प्रयासों से समाज में बौद्धिक जागरण आया?
क्या शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक चेतना को प्राथमिकता मिली?
दुर्भाग्य से अधिकतर मामलों में उत्तर नकारात्मक है। नए पंथ, नए झंडे, नए चिन्ह, नए धार्मिक ढांचे खड़े हुए, पर विचार वही पुराने रहे। जिस कर्मकांड, मूर्तिपूजा और बाहरी आडंबर से सतगुरु रविदास ने समाज को बाहर निकालने का प्रयास किया था, वही सब आज उनके नाम पर पुनः स्थापित किया जा रहा है।
असल आवश्यकता क्या थी?
यदि वास्तव में अलग पहचान बनानी थी, तो वह पहचान शिक्षा, विवेक और आत्मनिर्भरता की होनी चाहिए थी। समाज को स्कूल, कॉलेज, तकनीकी संस्थान, शोध केंद्र और रोजगार के अवसरों की आवश्यकता थी। परंतु हमने आसान रास्ता चुना — भावनाओं को भड़काने वाला जाति और धर्म का नशा।
भावनाओं के सहारे भीड़ तो जुटाई जा सकती है, पर समाज का उत्थान नहीं किया जा सकता। विचारों के बिना संगठन खोखले होते हैं और समय के साथ अपने ही उद्देश्य से भटक जाते हैं।
निष्कर्ष : जन्मोत्सव पर आत्ममंथन की आवश्यकता
सतगुरु रविदास का जन्मोत्सव मनाने का वास्तविक अर्थ यह नहीं कि हम उनके नाम के नारे लगाएँ या उनकी मूर्तियाँ और बड़ी करें। वास्तविक अर्थ यह है कि हम यह पूछने का साहस करें — क्या हम उनके बताए मार्ग पर चल रहे हैं या केवल उनके नाम का उपयोग कर रहे हैं।
सतगुरु रविदास ने मनुष्य को कर्म के आधार पर पहचानने की बात कही थी, न कि जन्म के आधार पर। यदि हम इस मूल विचार को स्वीकार कर लें, तो न नए पंथों की आवश्यकता पड़ेगी, न धार्मिक टकराव की, और न ही समाज को बाँटने वाली राजनीति की।
यही सतगुरु रविदास जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी —
उनके नाम का नहीं, उनके विचारों का अनुसरण।
आचार्य सुनील दास
संस्थापक सतगुरु रविदास महाराज जागृति मिशन एवम चैरिटेबल ट्रस्ट।

