Thursday, February 26, 2026
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रोहित वेमुला एक ऐसा नाम जो आज भी असामाजिक और जातिगत भेदभाव को दर्शाता है

“मेरे जन्म से मेरी मृत्यु तक का सफर
एक ऐसे इंसान का था
जिसे कभी इंसान नहीं माना गया…”

यह थे रोहित वेमुला के आखिरी शब्द,जो उन्होंने अपने अंतिम पत्र में लिखें। रोहित वेमुला का जन्म 30 जनवरी 1989 गुंटूर जिला आंध्र प्रदेश में हुआ। वह आर्थिक तौर पर गरीब और दलित परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनकी लड़ाई बचपन से ही शुरू हो गई थी। उन्होंने आरंभिक शिक्षा सरकारी स्कूल से शुरू की। इसके बाद वह उच्च शिक्षा पाने के लिए हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पहुंचे, जहां पर उनके विषय बायों साइंस का था। वह बहुत ही मैधावी छात्र थे। पढ़ने में बहुत होशियार और गहरी सामाजिक और राजनीतिक चिंतक भी थे। रोहित वोमेला अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के सदस्य भी थे। क्योंकि वे कार्ल मार्क्स, अंबेडकर और पेरियार फूल जैसे महान सामाजिक विचार रखने वाले महापुरुषों से प्रेरित थे।

यहीं से उनका और उनके दोस्तों का विवाद और निलंबन शुरू हुआ, क्योंकि 2015 में अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बीच में कुछ बातों को लेकर विवाद हुआ, जिसका कारण असामाजिक भेदभाव था। जिसे बाद में प्रशासन ने नकार दिया था ताकि केस को कमजोर किया जा सके। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने रोहित और उसके दोस्तों को हॉस्टल से बाहर निकाल दिया। उनकी फिलोशिप रोकर उनके साथ जातिवाद और है असामाजिक दुर्व्यवहार किया। उनकी मृत्यु का कारण आत्महत्या बताया जा रहा है। जो कि तारीख 17 जनवरी 2016 को हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में यह हादसा हुआ।

रोहित केवल एक छात्र ही नहीं थे बल्कि एक आवाज थे चेतन की, जागरूकता की। जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकाने पड़ी। आज भी “जस्टिस फॉर रोहित” के नाम के नारे लगते हैं। उनके अंतिम पत्र की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं।

मेरी आत्मा की कोई जाति ही नहीं थी,
पर मेरे शरीर को हमेशा
जाति से बांध दिया गया।

मैंने सितारों से प्यार किया,
पर मुझे मिट्टी में धकेल दिया गया।।

जो हमें साफ-साफ बताते हैं कि आज भी हमारे देश में है आसामाजिकता और जातिगत भेदभावना है जिसकी वजह से कितने रोहित वेमुला को अपनी जान देनी पड़ती है, या फिर यूं कहे कि जान गंवानी पड़ती है।

आज भी रोहित वेमुला सही तरह से इंसाफ नहीं मिल पाया है।

उनकी माता जी जिन्होंने एससी और सी एक्ट के तहत केस लड़ा। उनका मानना है, कि

“मेरा बेटा मरा नहीं है
उसको मारा गया है”!

जबकि प्रशासन कहता है की रोहित दलित थे ही नहीं, बल्कि उनको दलित बना दिया गया। पर वो शहिद है और दलित चेतना है। अब सवाल यह है क्या कभी हम इस व्यवस्था से उबर पाएंगे या फिर ऐसे ही लड़ते रहेंगे और मरते भी रहेंगे।।

नीलम अंबेडकर सोनीपत हरियाणा।

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