मूकनायक/ देश
किसी भी परिवार, समाज और देश का भविष्य उसके युवा ही निश्चित करते हैं। उन पर ही निर्भर करता है कि वो परिवार, समाज और देश की धरोहर, संस्कृति को कितना सम्मान देते हैं, उसकी सुरक्षा करते हैं और उसे आगे बढ़ाते है। किंतु वर्तमान भौतिक वादी युग में युवाओं में भौतिक सुख-सुविधाओं को अधिकाधिक पाने की ललक है, ना अपने परिवार, समाज, न संस्कृति की।
युवाओं की शक्ति और उनके जोश से सदैव किसी कार्य के आगे बढ़ने में बहुत सहायता होती है, फिर चाहे वो आजादी की लड़ाई हो, समाज उत्थान की या, संस्कारों को जीवित रखने की बात हो। इसलिए यह बहुत अनिवार्य है कि युवा वर्ग समाज की बागडोर संभाले एवं उसे उचित दिशा में उन्नति की ओर लेकर जाए।
समाज के कई वरिष्ठजन का यह मानना है कि युवाओं में जीवन का अनुभव नहीं है और बिना अनुभव के समाज की बागडोर देना उचित नहीं है क्योंकि आज का युवा बिना सोच समझकर जल्दबाजी में कोई फैसला लेता है तो वह समाज के लिए अहितकर हो सकता है, जबकि उनकी मानसिक भावना यह होती है कि यदि युवाओं को समाज की बागडोर संभला दी जाएगी तो उनका वर्चस्व समाप्त हो जाएगा, जबकि ऐसा कुछ नहीं होता है । समाज के वरिष्ठजन यह क्यों भूल जाते है कि हमारे समाज के जितने भी महापुरुष, साधु संत, समाज सुधारक हुए है वे भी तो कभी युवा ही थे, जिनके आदर्शों पर चलकर वर्तमान समाज विभिन्न संगठन, संस्थाएं बनाकर अनुकरण करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसी महान विभूतियों ने भी तो किसी ना किसी महान व्यक्तियों को आदर्श मानकर समाज उत्थान, समाज सुधार का बीड़ा उठाया था। अतः समाज के वरिष्ठजन को युवाओं का मार्ग दर्शन कर समाज उत्थान हेतु प्रेरित करना चाहिए ना कि जो युवा समाज सुधार और उत्थान की सोच रखने वालों का अवरोधक बनना चाहिए । अतः सामाजिक संगठनों और संस्थाओं में शत प्रतिशत उचित है युवाओं का जुड़ना । युवा पीढ़ी यानि कि हमारे नौजवान हमारे समाज का महत्वपूर्ण अंग है जिनमें इंद्रधनुषी रंग निर्माण का जज्बा होता है । हमारे समाज का भविष्य हमारी युवा पीढ़ी की सोच, व्यवहार व प्रदर्शन पर निर्भर करता है। युवा पीढ़ी में जोश, उमंग की कोई कमी नहीं होती है। वह हमेशा कामयाबी के शिखर तक पहुंचना चाहती है। अपने जुनून व काबिलियत, योग्यता से जिम्मेदारियों को वहन करके एक सुस्वरूप व सकारात्मक समाज की रचना कर सकते हैं।विकास की नींव रख सकते हैं। आज युवा पीढ़ी का सामाजिक संगठनों और संस्थाओं से जुड़ना 100% सही है। युवा सामाजिक संगठनों और संस्थाओं से जुड़कर समाज को नई राह दिखाकर सुसंस्कृत समाज को स्थापित कर सकता है। युवा पीढ़ी, वृद्धावस्था व आने वाली पीढ़ी के बीच सेतु की कड़ी है।
वह हमारे सामाजिक रीति रिवाज़ों, मूल्यों’ संस्कृति, पहचान की संवाहक है। हमारा समाज एक सुदृढ़, सुसभ्य, सुसंस्कृत एवं श्रेष्ठ समाज के रूप में स्थापित है फिर भी आज हमारे समाज में रूढ़िवादी परंपराएं, कुरीतियां, अंधविश्वास, पाखंड, नशा प्रवृति एवं अनेक बुराइयां व्याप्त है, अतः इसकी पहचान को बनाये रखने व आगे ले जाने के लिये युवा पीढ़ी को सामाजिक संगठनों और संस्थाओं से जुड़कर समय के साथ लय बनाकर अपना योगदान प्रदान कर अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहिए।
लेखक: बाबू लाल बारोलिया, अजमेर राजस्थान

