Thursday, February 26, 2026
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भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले: सामाजिक और शैक्षणिक क्रांति की अग्रदूत

भारत की पहली शिक्षिका एवं प्रथम महिला प्रधानाचार्य सावित्रीबाई फुले का जीवन भारतीय समाज में शिक्षा, समानता और महिला सशक्तिकरण की ऐतिहासिक मिसाल है। सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ। उस दौर में भारतीय समाज गहरे जातिभेद, वर्णभेद, लिंगभेद, अंधविश्वास और सामाजिक अत्याचारों से जकड़ा हुआ था। महिलाओं को शिक्षा, संपत्ति, स्वतंत्रता और सम्मान जैसे मूल अधिकारों से वंचित रखा गया था।

बाल विवाह की प्रथा के चलते वर्ष 1840 में सावित्रीबाई का विवाह पुणे निवासी ज्योतिबा फुले से हुआ। यही विवाह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बना। पति ज्योतिबा फुले के सहयोग से सावित्रीबाई ने शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सुधार और स्त्री शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया। मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होंने भारत में महिला शिक्षा की नींव रखकर इतिहास रच दिया।

सावित्रीबाई फुले न केवल भारत की पहली शिक्षिका बनीं, बल्कि समाज सुधारक, कवयित्री, विचारक और महिला आंदोलन की अग्रदूत भी रहीं। उन्होंने सदियों से शिक्षा से वंचित महिलाओं, शूद्र और अतिशूद्र वर्ग के लिए बंद दरवाजों को खोलने का साहसिक कार्य किया। वे एक सशक्त कवयित्री भी थीं और उनके काव्य संग्रह ‘काव्य फुले’ सहित छह पुस्तकें प्रकाशित हुईं। उन्होंने सामाजिक असमानता और स्त्री दमन का खुलकर विरोध किया।

पुणे में बालिका शिक्षा के प्रचार के लिए वे घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करती रहीं। इस दौरान उन्हें सामाजिक विरोध, अपमान और हमलों का भी सामना करना पड़ा। उनके ऊपर कीचड़ और गोबर फेंके गए, जान से मारने की धमकियां दी गईं, लेकिन वे अपने संकल्प से कभी पीछे नहीं हटीं। सामाजिक बहिष्कार के बाद भी उन्होंने उशा शेख और फातिमा शेख के सहयोग से शिक्षा अभियान को आगे बढ़ाया। वर्ष 1848 में पुणे के बुधवार पेठ में पहला विद्यालय खोलने के बाद मात्र तीन वर्षों में बिना किसी सरकारी सहायता के बालिकाओं के लिए 18 विद्यालयों की स्थापना कर दी।

वर्ष 1849 में मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के लिए भी शिक्षा केंद्र खोले गए, जिससे फातिमा शेख पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका बनीं। सावित्रीबाई फुले ने 1852 में महिला मंडल की स्थापना कर महिला आंदोलन को नई दिशा दी। विधवा विवाह, बालहत्या निषेध और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उन्होंने सशक्त अभियान चलाया। लोकलाज के डर से आत्महत्या का प्रयास कर रही कांति बाई को बचाकर उन्होंने बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की और जन्मे बालक यशवंत को गोद लेकर डॉक्टर बनाया।

वर्ष 1876–77 के भीषण अकाल में सत्यशोधक समाज के माध्यम से जरूरतमंदों को नि:शुल्क भोजन उपलब्ध कराया गया। 1890 में ज्योतिबा फुले के निधन के बाद सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कार्यों को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया। 1897 में प्लेग महामारी के दौरान वे निर्भीक होकर रोगियों की सेवा में जुटीं। एक पीड़ित बच्चे को बचाते समय वे स्वयं संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।

सावित्रीबाई फुले का योगदान भारतीय समाज के लिए अमूल्य है। उनके कार्यों की स्मृति में 3 जनवरी को भारतीय शिक्षा दिवस और 10 मार्च को भारतीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। सावित्रीबाई फुले अपने विचारों, संघर्ष और समर्पण के कारण सदैव समाज में अमर रहेंगी।

— एस. आर. कानडे
राष्ट्रीय ट्रस्टी
द बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया

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