मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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भारतीय संविधान दुनिया के सबसे प्रगतिशील दस्तावेजों में से एक है, जो समाज के हर वर्ग, विशेषकर पिछड़ों, शोषितों और अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करता है। एक सुरक्षा कवच तौर पर भारतीय संविधान ‘न्याय, स्वतंत्रता और समानता’ के सिद्धांतों पर आधारित है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से उन वर्गों को सशक्त बनाने का प्रयास किया, जो सदियों से हाशिए पर थे, परंतु इतने मजबूत संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद, आज भी ये वर्ग शोषण का शिकार हो रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में तो आज भी जाति आधारित हिंसा और सामाजिक बहिष्कार की घटनाएं सामने आती हैं । संसाधनों का असमान वितरण पिछड़ों को गरीबी के चक्र से बाहर नहीं निकलने दे रहा है । जागरूकता और संसाधनों की कमी व मंहगी व उचित शिक्षा अभाव के कारण शोषित समाज अपने संवैधानिक अधिकारों का पूरी तरह से लाभ नहीं उठा पाते ।
यहां यह विडंबना ही है कि शोषित वर्गों के लिए कानूनी प्रक्रिया अक्सर लंबी और खर्चीली साबित होती है, जिससे उन्हें समय पर न्याय नहीं मिल पाता । कई बार नीतियां केवल कागजों तक सीमित रह जाती हैं और उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाता। संविधान ने हमें ‘अधिकार’ अवश्य दिए हैं, लेकिन उन अधिकारों का वास्तविक लाभ तब तक नहीं मिल सकता, जब तक समाज की मानसिकता में बदलाव ना आए। केवल कानूनों से शोषण नहीं रुकेगा, बल्कि इसके लिए व्यापक शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक संवेदनशीलता की आवश्यकता है। जब तक समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति सुरक्षित महसूस नहीं करेगा, तब तक लोकतंत्र का लक्ष्य अधूरा रहेगा।
हमें संविधान को केवल एक किताब नहीं, बल्कि एक जीवित आचरण के रूप में अपनाना होगा।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

