मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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रिश्तों में गलतफहमियां, अपेक्षाएं और चुनौतियां आना स्वाभाविक है, लेकिन संवाद, धैर्य और आपसी सम्मान के साथ उन दरारों को भरना ही एक परिपक्व कला है और टूटे हुए विश्वास को फिर से जोड़ना और संघर्षों को सुलझाना रिश्तों को स्थायी और मजबूत बनाता है । निस्संदेह, कोई भी रिश्ता कांच की तरह नाजुक नहीं, बल्कि मिट्टी के उस घड़े की तरह होता है जिसे पकने के लिए तपिश और जुड़ने के लिए स्नेह की नमी की जरूरत होती है। रिश्तों में दरार आना अंत नहीं, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि वहां मरम्मत और थोड़े ज्यादा ‘वक्त’ की जरूरत है।
रहिम ने भी अपने दोहे में कहा है कि “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परिजाय” जो रिश्तों की नाज़ुकता को दर्शाता है। इसलिए टूटे हुए विश्वास को फिर से संजोना और झगड़ों से भागने के बजाय उन्हें मिलकर सुलझाना ही एक परिपक्व रिश्ते की असली पहचान है। जब हम इन चुनौतियों का सामना करते हैं, तो रिश्ता और भी गहरा और अटूट हो जाता है। रिश्ता निभाना एक निरंतर प्रक्रिया है। यह “परफेक्ट” होने के बारे में नहीं, बल्कि उन खामियों के साथ एक-दूसरे को स्वीकार करने के बारे में है जो हमें इंसान बनाती हैं।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

