मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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प्रायः यह देखा गया है कि अच्छे समय में हमारे आसपास लोगों की भीड़ होती है। हर कोई अपना होने का दावा करता है, लेकिन जैसे ही हमें किसी आर्थिक, मानसिक या शारीरिक सहायता की ‘जरूरत’ पड़ती है तो लोग दूर होने लगते हैं। जो कल तक साथ चलने की कसमें खाते थे, वे अचानक मजबूरियां गिनाने लगते हैं। “अभी समय ठीक नहीं है”, “मैं खुद परेशान हूँ” जैसे बहाने रिश्तों की असलियत सामने ला देते हैं। यहाँ व्यक्ति को अपनी सहायता ना मिलने का उतना दुख नहीं होता, जितना अपनों के झूठे बहानों से पहुँचता है। दुख की घड़ी में इंसान पहले से ही टूटा हुआ होता है। ऐसे में उसे सहानुभूति और हौसले की जरूरत होती है ।
यहां विडंबना यह है कि बहुत से ‘अपने’ मदद करने के बजाय व्यक्ति की गलतियों को कुरेदने लगते हैं। जब अपने ही पीठ दिखा दें, तब व्यक्ति को अपनी शक्ति का एहसास होता है। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हर हाथ मिलाने वाला दोस्त नहीं होता और हर मीठा बोलने वाला अपना नहीं होता। बुरा वक्त हमें यह पहचानने का अवसर देता है कि कौन हमारे साथ है और कौन हमारे साथ होने का नाटक कर रहा है। इसीलिए दूसरों की प्रतिक्रिया पर दुखी होने के बजाय हमें खुद को इतना मजबूत बनाना चाहिए कि ना किसी के बहानों से हमारा काम रुके और ना ही किसी के तानों से हमारा हौसला टूटे।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

