मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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संतों और महापुरुषों ने जीवन की तुलना ओस की बूंद या पानी के बुलबुले से की है। पानी की एक बूंद को सूखने में या बिखरने में क्षण भर का समय लगता है। ठीक वैसे ही, इंसान का जीवन भी अनिश्चित है। हम नहीं जानते कि आने वाला पल हमारे लिए क्या लेकर आएगा। जन्म और मृत्यु के बीच का यह सफर इतना छोटा है कि जब तक हम इसे पूरी तरह समझ पाते हैं, तब तक समय हाथ से मिट्टी की तरह फिसल चुका होता है। प्रकृति के इस विराट चक्र में मनुष्य का अस्तित्व एक छोटे से कण जैसा ही है।
विडंबना यह है कि इस नश्वर शरीर के भीतर पलने वाला ‘अहंकार’ असीम है। मनुष्य अक्सर अपनी शक्ति, पद, धन और ज्ञान के मद में यह भूल जाता है कि वह क्षणभंगुर है। जीवन की सार्थकता इस बात में नहीं है कि हम कितना अहंकार पालते हैं, बल्कि इसमें है कि हम अपनी नश्वरता को स्वीकार कर कितनी विनम्रता से जीते हैं। यदि हम यह स्वीकार कर लें कि हम केवल ‘पानी की एक बूंद’ हैं, तो हम सागर बनने की व्यर्थ होड़़ छोड़़कर मानवता के प्रेम में विलीन हो सकते हैं। अहंकार को त्याग कर ही मनुष्य उस शांति को प्राप्त कर सकता है, जो किसी भी सांसारिक उपलब्धि से कहीं अधिक मूल्यवान है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

