Thursday, February 26, 2026
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आंबेडकर की संवैधानिक दृष्टि और आज का भारत

अरविन्द केरन | डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर को भारतीय संविधान का शिल्पकार कहा जाता है, लेकिन उनका योगदान केवल एक कानूनी ढाँचा तैयार करने तक सीमित नहीं था। उनके लिए संविधान सामाजिक परिवर्तन का औज़ार था—ऐसा औज़ार जो उन करोड़ों लोगों की आवाज़ बने, जिन्हें सदियों तक हाशिए पर रखा गया। आज, जब संवैधानिक मूल्यों पर सार्वजनिक बहस तेज़ है, आंबेडकर की संवैधानिक दृष्टि को समझना और भी आवश्यक हो जाता है।

आंबेडकर मानते थे कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक है। इसी कारण उन्होंने संविधान में समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को केंद्रीय मूल्य बनाया। संविधान सभा में उन्होंने स्पष्ट कहा था, “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो।” यह कथन आज के भारत की सामाजिक वास्तविकताओं को समझने की कुंजी है, जहाँ संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक व्यवहार के बीच अक्सर दूरी दिखाई देती है।

संविधान को लेकर आंबेडकर की सोच आदर्शवादी होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी थी। वे जानते थे कि केवल प्रगतिशील प्रावधान पर्याप्त नहीं होंगे। संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने चेतावनी दी थी, “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो वह खराब साबित होगा।” आज जब संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, असहमति के अधिकार और नागरिक स्वतंत्रताओं पर सवाल उठते हैं, यह चेतावनी और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है।

आंबेडकर संविधान को अभिजात वर्ग का दस्तावेज़ नहीं बनाना चाहते थे। उनका मानना था कि संविधान आम नागरिक के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करे। उन्होंने कहा था, “संविधान केवल वकीलों का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक माध्यम है।” इसी सोच के कारण मौलिक अधिकारों में समानता का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता को केंद्रीय स्थान दिया गया। अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत का उन्मूलन केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सदियों की सामाजिक हिंसा के विरुद्ध संवैधानिक हस्तक्षेप था।

सामाजिक न्याय आंबेडकर की संवैधानिक दृष्टि का मूल आधार था। अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण को उन्होंने किसी विशेष वर्ग को दिया गया लाभ नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय के सुधार का संवैधानिक उपाय माना। उनका तर्क था कि समान अवसर की बात तब तक अर्थहीन है, जब तक समाज में गहरी असमानताएँ मौजूद हैं। आज आरक्षण को लेकर होने वाली बहसों में अक्सर इस मूल भावना को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

धर्मनिरपेक्षता आंबेडकर के संविधान का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रही। वे धर्म की स्वतंत्रता के पक्षधर थे, लेकिन धर्म के राजनीतिक उपयोग को लोकतंत्र के लिए ख़तरा मानते थे। उनके अनुसार, राज्य का कर्तव्य किसी एक धार्मिक पहचान को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना है। आज के भारत में धर्म और राजनीति के बढ़ते घालमेल के बीच आंबेडकर की यह सोच विशेष महत्व रखती है।

आंबेडकर के लिए लोकतंत्र केवल चुनावों या सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं था। उन्होंने लोकतंत्र को एक नैतिक व्यवस्था के रूप में देखा। उनका प्रसिद्ध कथन, “लोकतंत्र केवल शासन की प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है,” यह स्पष्ट करता है कि संविधान तभी जीवित रह सकता है, जब समाज में संवाद, सहिष्णुता और असहमति के लिए स्थान बना रहे।

आज का भारत वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक देश के रूप में उभर रहा है, लेकिन साथ ही संवैधानिक मूल्यों की व्याख्या और सीमाओं को लेकर गंभीर चुनौतियों का सामना भी कर रहा है। ऐसे समय में आंबेडकर की संवैधानिक दृष्टि हमें यह याद दिलाती है कि संविधान की रक्षा केवल न्यायालयों या संस्थाओं की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि नागरिक चेतना की भी परीक्षा है।

निष्कर्षतः, आंबेडकर का संविधान कोई स्थिर दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में चलने वाली सतत प्रक्रिया है। यह उन आवाज़ों का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्हें इतिहास ने दबाया। आज आवश्यकता है कि संविधान को केवल औपचारिक सम्मान न दिया जाए, बल्कि उसके मूल उद्देश्य—समानता और गरिमा—को सामाजिक व्यवहार और सार्वजनिक नीतियों में उतारा जाए। आंबेडकर का भारत वही होगा, जहाँ संविधान केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि समाज के विवेक में जीवित रहेगा।

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