डॉ नीरज कुमार/ मूकनायक शिमला | पटवारी भर्ती के नाम पर वसूली जा रही 800 रुपये की फीस अपने आप में एक कड़वी सच्चाई है। परीक्षा शुल्क मात्र 100 रुपये है, जबकि तथाकथित “प्रोसेसिंग फीस” के नाम पर 700 रुपये वसूले जा रहे हैं, जिनका न कोई तर्क है और न कोई औचित्य। यह साफ संकेत है कि यह व्यवस्था परीक्षा से अधिक कमाई पर केंद्रित है।
विडंबना यहीं समाप्त नहीं होती। यदि आवेदन करते समय अभ्यर्थी या साइबर कैफे से कोई छोटी-सी तकनीकी त्रुटि हो जाए, तो उसी गलती को सुधारने के नाम पर फिर से 100 रुपये ऐंठ लिए जाते हैं। इस प्रकार एक सामान्य अभ्यर्थी से 900 रुपये तक वसूले जाते हैं।
इसके बाद परीक्षा आयोजित की जाती है और फिर जानबूझकर 6–8 आसान प्रश्नों की उत्तर-कुंजी गलत जारी की जाती है। जब अभ्यर्थी आपत्ति दर्ज कराते हैं, तो प्रति प्रश्न 200 रुपये की फीस ली जाती है। इस तरह एक उम्मीदवार से औसतन लगभग 1000 रुपये वसूले जाते हैं।
अब आते हैं असली मुद्दे पर।
यह सरकार आर्थिक बदहाली से नहीं, बल्कि बेरोजगार युवाओं का खून निचोड़कर अपनी तिजोरी भरने की मानसिकता से ग्रस्त दिखती है।
मान लीजिए यदि 2 लाख बेरोजगार युवा आवेदन करते हैं—
2,00,000 × 800 = 16 करोड़ रुपये
औसतन 2% करेक्शन फीस = 4 लाख रुपये
यदि केवल 20,000 अभ्यर्थी 5 प्रश्नों की आपत्ति दर्ज करें—
20,000 × 5 × 200 = 2 करोड़ रुपये
कुल सरकारी कमाई: 18 करोड़ 4 लाख रुपये
अब दूसरी ओर सच्चाई देखिए—
कुल चयनित पटवारी: 530
प्रस्तावित मासिक वेतन: 12,000 रुपये
12,000 × 530 = 63 लाख 60 हजार रुपये प्रति माह
यानी बेरोजगार युवाओं से वसूली गई फीस से सरकार लगभग 28 महीनों तक भर्ती किए गए पटवारियों का वेतन निकाल सकती है।
यह भर्ती प्रक्रिया रोजगार देने का माध्यम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक मॉडल बन चुकी है—जहां जैसे ही यह फीस समाप्त होती है, तुरंत दूसरी भर्ती निकाली जाती है, फिर कभी पेपर लीक, कभी तकनीकी खामी और कभी मामला अदालतों में लटका दिया जाता है।
न रोजगार की गारंटी, न पारदर्शिता—सिर्फ और सिर्फ बेरोजगार युवाओं की मजबूरी का दोहन।

