

पत्रकार अनिल साखरे की✍️ कलम से
डॉ बाबासाहेब अंबेडकर जी ने अपने समाज के लोगों के लिए विकास एवं उद्धार के लिए तीन संकल्प सूत्र दिए थे शिक्षित बनो, संगठित रहो, एवं संघर्ष करो बाबा साहब का यह मानना था कि जब तक मेरा समाज शिक्षित नहीं होगा किसी भी क्षेत्र में विकास नहीं कर पाएगा । वे जानते थे आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक विकास के लिए शिक्षा बहुत जरूरी मूल मंत्र है तभी वे कहते थे शिक्षा शेरनी का दूध है जो पियेगा वह दहाड़ेगा।
शिक्षा के क्षेत्र में डॉ बाबा साहब अंबेडकर का योगदान अतुलनीय है।उन्होंने शिक्षा को केवल साक्षरता के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन समानता और आत्मसम्मान के सबसे शक्तिशाली हथियार के रूप में देखा।
डॉ बाबासाहेब अंबेडकर ने केवल विचार ही नहीं दिए बल्कि जमीनी स्तर पर काम करने के लिए कई शिक्षण संस्थाएं बनाई ।
- सन 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की जिसमें दलितों के बीच शिक्षा और संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य किया ।
- सन 1945 में पीपल्स एज्युकेशन सोसायटी बनाई इसका उद्देश्य समाज के गरीब और पिछड़े वर्गों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्रदान करना था l इसी समिति के तहत सन 1946 में मुंबई (फोर्ट) में सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ साइंस एवं कॉमर्स की स्थापना की । सन 1947 में सिद्धार्थ कॉलेज आफ लॉ एवं सन 1950 में औरंगाबाद में मिलिंद कॉलेज की स्थापना की।
- साथ हीं उन्होंने हॉस्टल की भी सुविधा दी ताकि दूर-दराज से आने वाले छात्रों को रहने एवं खाने की सुविधा हो सके।
डॉ बाबासाहेब अंबेडकर ने 16 छात्रों को पढ़ाई के लिए लंदन भेजा था । डॉ बाबासाहेब द्वारा चुने 15 छात्रों में से जिन्हें सरकारी खर्च पर इंग्लैंड जाकर पढ़ाई करनी थी उसमें भाऊराव देवाजी खोबरागड़े को मुख्य रूप से चुना गया था । लेकिन देवाजी खोबरागड़े ने भाऊराव खोबरागड़े को अपने खर्चे पर भेजा ताकि अनुसूचित जाति के समुदाय के एक और छात्र को सरकारी स्कॉलरशिप का फायदा मिल सके ।
डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर ने शिक्षा हेतु जिन्हें लंदन भेजा था उनमें उईके, वानखेडे, जेजूरिकर, आवले, बेहरा,बी. सी. गायकवाड,निखाले कायाड़, कदम, बी. डी. खोबरागड़े, कलोता,राय, कायल, कांबले, गायकवाड और बोबडे ।
उक्त सभी छात्र लंदन में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तब डॉ बाबा साहब अंबेडकर उनके उत्साह वर्धन करने हेतु 2 नवंबर 1946 को बाबा साहब लंदन गए थे। अंत में –
अनकहे शब्दों के बीच से
थक जाता हूं कभी-कभी
पता नहीं खामोश रहना
मजबूरी है या समझदारी

