Thursday, February 26, 2026
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हरिजन शब्द का प्रयोग: अनैतिक, कानूनी रूप से प्रतिबंधित और संवैधानिक पहचान के विरुद्ध

मूकनायक/ डॉ. नीरज कुमार/ शिमला संभाग प्रभारी

‘हरिजन’ एक शब्द जो कभी करुणा और सामाजिक सुधार का प्रतीक माना जाता था, आज समानता और आत्मसम्मान के युग में विवाद का विषय बन चुका है।
महात्मा गांधी ने इस शब्द को उस समय गढ़ा था जब समाज में अस्पृश्यता का कलंक व्याप्त था। गांधीजी की दृष्टि में यह शब्द सम्मान का प्रतीक था: “ईश्वर के लोग”। किंतु, समय के साथ यह शब्द अपनी भावनात्मक पवित्रता खो चुका है।
अब यह शब्द संरक्षकता (Patronizing Attitude) का द्योतक बन गया है, जो उस समुदाय को “दयाभाव” की दृष्टि से देखता है, न कि समान अधिकारों वाले नागरिक के रूप में। आज के संदर्भ में यह शब्द न केवल अप्रासंगिक बल्कि संवैधानिक पहचान और सामाजिक आत्मसम्मान के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है।
1. नैतिक और सामाजिक दृष्टि से अस्वीकार्य
‘हरिजन’ शब्द को अब नैतिक रूप से अनुचित माना जा रहा है, क्योंकि यह आधुनिक लोकतंत्र की मूल भावना समान नागरिकता का विरोध करता है।
संरक्षकता का भाव: यह संकेत देता है कि समाज का यह वर्ग किसी “उच्चतर” समूह के संरक्षण का पात्र है, जिससे समानता का सिद्धांत आहत होता है।
पहचान का हनन: अनुसूचित जातियों के समुदाय ने अब अपनी आत्म-परिभाषा स्वयं तय की है, ‘दलित’ या ‘अनुसूचित जाति’। इस पर किसी बाहरी शब्द को थोपना नैतिक रूप से गलत है।
मानवाधिकारों का प्रश्न: आत्म-सम्मान से जीने का अधिकार मौलिक है। यदि कोई शब्द किसी समुदाय को अपमानजनक लगे, तो उसका प्रयोग सामाजिक न्याय और मानव गरिमा के विरुद्ध माना जाएगा।
2. कानूनी और संवैधानिक प्रतिबंध
यह केवल नैतिकता का नहीं, बल्कि कानून और संविधान का भी प्रश्न है।
(A) सरकारी निर्देश और संवैधानिक शब्दावली
भारत का संविधान स्पष्ट रूप से “अनुसूचित जाति (Scheduled Caste)” शब्द का उपयोग करता है।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने अपने निर्देशों में यह कहा है कि किसी भी आधिकारिक दस्तावेज़, आदेश, प्रमाणपत्र या संवाद में ‘हरिजन’ अथवा ‘दलित’ शब्द का प्रयोग न किया जाए।
2018 में केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और विभागों को पत्र भेजकर यह स्पष्ट कर दिया कि केवल “Scheduled Caste” शब्द ही मान्य है।
(B) न्यायिक दृष्टिकोण और आपराधिक जोखिम
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति के सदस्य को जातिसूचक या अपमानजनक शब्द से संबोधित करता है, तो यह दंडनीय अपराध है।
कई न्यायिक मामलों में न्यायालयों ने यह माना है कि यदि “हरिजन” शब्द का प्रयोग अपमानजनक भाव में किया जाए, तो यह अधिनियम के तहत कार्रवाई योग्य है।
इस प्रकार, इस शब्द का प्रयोग न केवल संवैधानिक भावना का उल्लंघन है, बल्कि आपराधिक जोखिम भी उत्पन्न कर सकता है।
3. संस्थानों और संगठनों के लिए सख्त निर्देश
संविधान और मानव गरिमा की रक्षा करने वाले सभी संगठनों चाहे वे सरकारी हों या निजी को निम्न कदम तुरंत उठाने की आवश्यकता है:
तत्काल रोक: किसी भी प्रकार के पत्राचार, प्रकाशन, सर्वेक्षण, रिपोर्ट, या कार्यक्रम में ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग तुरंत बंद किया जाए।
संवैधानिक शब्दावली अपनाएँ: केवल ‘अनुसूचित जाति (Scheduled Caste)’ शब्द का प्रयोग किया जाए। ‘दलित’ शब्द का प्रयोग भी तभी किया जाए जब संबंधित समुदाय स्वयं इसका उपयोग करे।
प्रशिक्षण और जागरूकता: कर्मचारियों, पत्रकारों और शिक्षकों को इस विषय पर संवेदनशीलता और कानूनी प्रावधानों की जानकारी दी जाए।
रिकॉर्ड संशोधन: पुराने दस्तावेज़ों, संस्थानों या कॉलोनियों के नामों में यदि यह शब्द शामिल है, तो उन्हें संवैधानिक शब्दावली से प्रतिस्थापित किया जाए।
‘हरिजन’ शब्द को त्यागना केवल भाषा का प्रश्न नहीं है यह समानता, गरिमा और संवैधानिक नैतिकता का प्रश्न है।
भारत की लोकतांत्रिक चेतना अब उस युग से आगे बढ़ चुकी है जहाँ दया को सम्मान समझा जाता था।
अब समय है कि हर संस्था, हर मीडिया समूह, और हर शैक्षिक निकाय यह संदेश दे कि समानता किसी उपहार का नहीं, अधिकार का विषय है।

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