मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आधुनिक युग में हर माता-पिता की यह इच्छा होती है कि उनके बच्चे जीवन में सफल और समृद्ध बनें। इस चाह में, अक्सर शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य धन कमाना और भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करना माना जाता है। बच्चों को दी जाने वाली सबसे बड़ी विरासत धन नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार हैं। धन आज है कल नहीं, लेकिन संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते रहते हैं। एक संस्कारी बच्चा, यदि धनवान नहीं भी बनता है, तो भी वह एक सुखी, संतुष्ट और सम्मानित जीवन जीता है। इसलिए, माता-पिता का परम कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों को धनवान बनाने के बजाय, बेहतर इंसान और संस्कारी नागरिक बनाने पर ध्यान केंद्रित करें।
हालांकि, सच्चा और स्थायी सुख धन-दौलत से नहीं, बल्कि अच्छे संस्कारों से मिलता है। धन तो आता-जाता रहता है, लेकिन संस्कार व्यक्ति के व्यक्तित्व की नींव होते हैं, जो उसे जीवन भर सही दिशा दिखाते हैं। बच्चों को अच्छे संस्कार देने के लिए माता-पिता को स्वयं एक आदर्श बनना होगा, सम्मान और सहानुभूति सिखाना होगा और सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करना होगा। इसके अतिरिक्त, बच्चों को नियमों का पालन करना सिखाना, उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना और कहानियों या खेल के माध्यम से सही-गलत की शिक्षा देना भी महत्वपूर्ण है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

