मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मकान मूल रूप से एक भौतिक आवश्यकता की पूर्ति है। यह चार दीवारों, छत, दरवाजों और खिड़कियों से बनी एक कंक्रीट की संरचना है, जो हमें धूप, बारिश और बाहरी दुनिया से सुरक्षा प्रदान करता है। इसका निर्माण तर्कसंगत और व्यावहारिक (मजबूती, स्थान और उपयोगिता जैसी) जरूरतों पर आधारित होता है । हम एक खाली इमारत को “मकान” कहते हैं क्योंकि उसमें अभी जीवन का संचार नहीं हुआ है। इसके विपरीत, जब उसी मकान में लोग रहने लगते हैं, हँसते-बोलते हैं, और एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं, तो वह ‘घर’ बन जाता है। घर केवल एक पता नहीं है । यह एक भावना है। यह वह जगह है जहाँ परिवार के सदस्यों के बीच विश्वास पनपता है, जहाँ दिल मिलते हैं और जहाँ अनगिनत यादें संजोई जाती हैं।
घर की बुनियाद विश्वास, प्रेम, और मानवीय भावनाओं से निर्मित होती है और हँसी, खुशी, उदासी, सहानुभूति – ये सभी भावनाएँ मिलकर घर का वातावरण बनाती हैं। मकान और घर के बीच का अंतर सिर और दिल के बीच के अंतर जैसा है। मकान एक शरीर है, जबकि घर उसकी आत्मा है। एक मकान खरीदा या बनाया जा सकता है, लेकिन एक घर को विश्वास, प्रेम, और भावनाओं के साथ समय समय पर संवारा और बसाया जाता है। असली खुशी किसी बड़ी इमारत में नहीं, बल्कि उस घर में मिलती है, जहाँ दिल बसता है और जहाँ मधुर रिश्ते पनपते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

