Thursday, February 26, 2026
Homeहिमाचल प्रदेशबाबा साहब दलित आदिवासियों के लिए प्रतिनिधित्व चाहते थे सत्ता की गुलामी...

बाबा साहब दलित आदिवासियों के लिए प्रतिनिधित्व चाहते थे सत्ता की गुलामी नहीं |

मूकनायक/ डॉ. नीरज कुमार/ शिमला: सत्ता की दलाली में बिक गया प्रतिनिधित्व
भारत में राजनीतिक आरक्षण जिस आदर्श के साथ आरंभ हुआ था, आज वह अपनी आत्मा खो चुका है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण इसलिए मांगा था ताकि उन्हें सत्ता संरचना में स्वतंत्र और प्रभावी प्रतिनिधित्व मिले। इसी आधार पर उन्होंने कम्युनल अवार्ड के द्वारा अपने लिए अलग से प्रतिनिधि चुनने का रास्ता बनाया था, लेकिन गांधी और कांग्रेस की हिन्दू वोटर को एक रखने की जिद के कारण वह प्रतिनिधित्व आरक्षण बन गया। आज प्रतिनिधिव की जो स्थिति है, उसमें आरक्षण महज़ एक राजनीतिक औजार बन गया है। जिसे दलितों के सशक्तिकरण के बजाय सत्ता की गद्दी को स्थिर रखने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
सच्चाई यह है कि आज की राजनीति में आरक्षित सीटों से जीतने वाले अधिकांश प्रतिनिधि अपने समाज के नहीं, बल्कि उन बहुसंख्यक, मनुवादी और शोषक वर्गों के हितों की रक्षा करते हैं जिनकी कृपा से उन्हें टिकट मिलता है। वे दलितों या आदिवासियों की आवाज़ नहीं, बल्कि अपने दलों के आदेशों की गूंज बनकर रह गए हैं।
इस तरह आरक्षण की मूल भावना: सामाजिक न्याय और आत्म-सम्मान, सत्ता की सीढ़ियों में कहीं खो गई है।
राजनीतिक पार्टियां भी इस खेल की सबसे बड़ी खिलाड़ी हैं। वे आरक्षित सीटों पर उन्हीं उम्मीदवारों को उतारती हैं जो “ऊपर” के निर्देशों का पालन करें, जनता के प्रति जवाबदेह न हों। परिणाम यह हुआ कि दलित प्रतिनिधित्व का अर्थ बन गया- “वफादारी का इनाम”। इन सीटों से ऐसे लोग विधानसभा और संसद में पहुंच रहे हैं जो अपनी ही जाति के सवाल उठाने से डरते हैं, क्योंकि यदि वे सच बोलेंगे तो बहुसंख्यक समाज उन्हें वोट नहीं देगा। इस परिस्थिति ने आरक्षण को “बिना घास की जड़” बना दिया है: दिखने में हरा, पर भीतर से सूखा। जिन्हें समाज को हरा भरा करना था वही सत्ता की हवा के साथ उड़कर दलित समाज में ही गंदगी का कारण बन गया है।
यह वही स्थिति है जिसकी चेतावनी स्वयं डॉ. आंबेडकर ने दी थी। उन्होंने कहा था, “अगर दलित प्रतिनिधि स्वतंत्र नहीं होंगे तो आरक्षण व्यर्थ है।” आज वह चेतावनी भविष्यवाणी बन चुकी है। सत्ता के गलियारों में आरक्षित नेता हैं, पर उनकी आवाज़ किसी और की है। दलित राजनीति अब आत्मसम्मान की नहीं, बल्कि सत्ता-समर्पण की राजनीति बन चुकी है।
जरूरत इस बात की है कि आरक्षण को फिर से उसके मूल उद्देश्य: सामाजिक समानता और राजनीतिक स्वायत्तता से जोड़ा जाए। जब तक दलित-आदिवासी समुदाय अपने स्वतंत्र नेतृत्व को खड़ा नहीं करेगा, तब तक आरक्षण केवल प्रतीक रहेगा, अधिकार नहीं।
भारत में आरक्षण का पेड़ अब भी खड़ा है, पर उसकी जड़ें सूख रही हैं। सवाल यह नहीं कि आरक्षण रहे या नहीं, सवाल यह है कि क्या यह वही आरक्षण है, जिसका सपना बाबा साहेब ने देखा था?

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments