मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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अक्सर इंसान में धैर्य व सहनशीलता का अभाव आम देखने को मिलता है। संस्कार व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में संयम, सहानुभूति और नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। यह वह नींव है, जो बचपन से ही परिवार, समाज और संस्कृति के माध्यम से मिलती है। छोटे बच्चे, नवयुवक या अन्य किसी भी आयु का शख्स, अपनी इच्छा के विपरित कुछ भी सुनने पर क्रोध से भरकर नकारात्मक प्रतिक्रिया करते हैं जिसमें कलह व झगड़े का जन्म होता है और उसमें पारिवारिक संस्कारों की कमी भी स्पष्ट उजागर होती है ।
वहीं घर में, समाज में, ग्रुप में, परिचित या अपरिचित लोगों के सम्मुख इस प्रकार से अभद्र व्यवहार व टिप्पणी करना हमारे स्वभाव का एक अंग सा बन गया है। इन हालातों में क्रोध आने पर हमारे अंदर एक प्रकार की मूढ़ता आ जाती है और यही हमारी स्मृति के भ्रष्ट होने का कारण बनती है जिसके फलस्वरूप यदि अपने संस्कार व गुणों को निखारना है तो इंसान के लिए सहनशील बनना ही हितकारी है क्योंकि धन, संपत्ति या भौतिक उपलब्धियाँ समय के साथ फीकी पड़ सकती हैं, लेकिन सहनशीलता, संस्कार और ईमानदारी की विरासत पीढ़ियों तक जीवित रहती है। ये गुण किसी व्यक्ति को ना केवल सम्मान दिलाते हैं, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनते है ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

