मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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धर्म के बारे में बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि ”मैं उस धर्म को पसंद करता हूं, जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है। धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं। जो धर्म जन्म से एक को श्रेष्ठ और दूसरे को नीच बनाए रखे वह धर्म नहीं गुलाम बनाए रखने का षडयंत्र है।” वहीं जो धर्म ऊंच-नीच में विश्वास करता हो, जात-पांत में विश्वास करता हो, भेदभाव में विश्वास करता हो, छुआछूत में विश्वास करता हो, उसे क्या धर्म कहा जा सकता है। भले ही आप धर्म के नाम पर गर्व करते रहें, परंतु कोई भी धर्म जो मानव-मानव में भेदभाव करता है, उस पर गर्व कैसे किया जा सकता है ? धर्म तो परोपकार में विश्वास करता है। शांति, अमन-चैन में विश्वास करता है। हर मानव के कल्याण में विश्वास करता है। फिर ये कौन सा धर्म है, जो हिंसा और दंगे-फसाद करवाता है। अमानवीयता की सारी हदें पार कर जाता है।
यहां यह विडंबना ही है कि धर्म से उपजी जात-पांत के नाम पर दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। उनके घोड़ी पर चढ़ने, मूंछ रखने, किसी गैर जाति खास कर कथित उच्च जाति की लड़की से प्रेम करने पर सजा-ए-मौत दी जाती है। घड़े या लोटे या हैंड पंप से पानी पीेने पर उनके साथ मारपीट की जाती है। उनको जातिसूचक गालियां दी जाती हैं। उनको थूक कर चटवाया जाता है। उनके ऊपर पेशाब कर दिया जाता है या पेशाब पीने को मजबूर किया जाता है। दलित महिलाओं के साथ बलात्कार, यौन हिंसा, उनकी निर्मम हत्याएं जैसे अपराध होना तो आम बात हैं। ये सब कुकृत्य अमानवीयता कथित धर्म के नाम पर होते हैं। धर्म का मूल उद्देश्य लोगों को जोड़ना और नैतिक बनाना होना चाहिए, ना कि उन्हें बांटना। बाबा साहेब डॉ. भीम राव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, और पेरियार जैसे अनेक समाज सुधारकों ने भी जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज बनाने के लिए संघर्ष किया। एक मजबूत और समृद्ध राष्ट्र के निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि हम जाति, धर्म और मजहब के संकीर्ण विचारों से ऊपर उठकर मानवता और राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि रखें ।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

